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Accountant acquitted in 12-year-old bribery case; High Court states that mere recovery of the amount is not sufficient.
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सूरजपुर जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के लेखापाल मुरली प्रसाद चौधरी को 12 साल पुराने रिश्वतखोरी के मामले में बरी कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केवल रिश्वत की रकम बरामद होना दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को रिश्वत की मांग और उसके स्वीकार किए जाने का तथ्य भी ठोस साक्ष्यों से साबित करना होगा।
जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने विशेष न्यायालय, सूरजपुर द्वारा मार्च 2017 में सुनाए गए सजा के आदेश को रद्द कर दिया। हाई कोर्ट ने मामले में अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों की जांच के बाद आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।
अभियोजन के अनुसार, मां सरस्वती शिक्षा समिति के प्रबंधक मोहित राम राजवाड़े ने जून 2014 में एसीबी से शिकायत की थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि स्कूल की मान्यता के एवज में लेखापाल मुरली प्रसाद चौधरी ने 15 हजार रुपये रिश्वत की मांग की थी।
इसके बाद 30 जून 2014 को एसीबी ने ट्रैप कार्रवाई की। कार्रवाई के दौरान लेखापाल की जेब से 8 हजार रुपये बरामद किए जाने का दावा किया गया था।
मामले की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने अपने पहले के आरोपों का समर्थन नहीं किया। उसने अदालत में कहा कि लेखापाल ने उससे रिश्वत की मांग नहीं की थी।
शिकायतकर्ता के साथ गए गवाह ने भी अभियोजन के मामले को समर्थन नहीं दिया। गवाह के अनुसार, रुपये शिकायतकर्ता ने स्वयं लेखापाल की जेब में रखे थे और लेखापाल ने तत्काल रुपये वापस करने का प्रयास किया था।
एसीबी की ओर से पेश की गई ऑडियो रिकॉर्डिंग को लेकर भी हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण कमियां पाईं। अदालत ने नोट किया कि रिकॉर्डिंग के संबंध में आवश्यक 65-बी प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया गया था।
इसके अलावा आरोपी की आवाज का नमूना लेकर उसकी एफएसएल जांच भी नहीं कराई गई थी। इन परिस्थितियों में रिकॉर्डिंग को दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना गया।
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के नीरज दत्ता और पी. सोमराजू मामलों का हवाला देते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में रिश्वत की मांग का साबित होना आवश्यक है। केवल रिश्वत की रकम की बरामदगी के आधार पर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
हाई कोर्ट ने विशेष न्यायालय के मार्च 2017 के सजा आदेश को रद्द करते हुए मुरली प्रसाद चौधरी को मामले में बरी कर दिया। साथ ही अदालत ने जमा की गई जुर्माना राशि वापस करने के निर्देश भी दिए।