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MP News: Bhagirathpura contaminated water scandal; High Court strict, directs Municipal Corporation to submit records within 10 days
इंदौर। इंदौर के चर्चित भागीरथपुरा दूषित पानी कांड को लेकर गुरुवार को हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। अदालत ने पाया कि नगर निगम ने अब तक कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जांच समिति के सामने पेश नहीं किए हैं। इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए कोर्ट ने नगर निगम को 10 दिनों के भीतर सभी जरूरी रिकॉर्ड जांच समिति को सौंपने के निर्देश दिए हैं।
पानी में दवा जैसी गंध की शिकायत
सुनवाई के दौरान वकीलों ने अदालत को बताया कि भागीरथपुरा क्षेत्र के लोगों ने नलों से आने वाले पानी में दवा जैसी तेज गंध होने की शिकायत की थी। कुछ लोगों ने पानी का रंग गंदा होने की भी बात कही। इस पानी का सेवन करने के बाद कई लोग अचानक बीमार पड़ गए। प्रभावित लोगों के बयान और बातचीत को रिकॉर्ड कर पेन ड्राइव में सुरक्षित रखा गया है, जिसे अदालत में पेश किया जाएगा।
टैंक में पोटेशियम क्लोराइड डालने का दावा
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागड़िया ने दावा किया कि भागीरथपुरा के वार्ड नंबर 11 के ओवरहेड टैंक में पोटेशियम क्लोराइड (KCl) की टैबलेट डाली गई थीं। याचिका में कहा गया है कि पोटेशियम क्लोराइड पीने के पानी को शुद्ध करने के लिए स्वीकृत केमिकल नहीं है। यह न तो क्लोरीनेशन एजेंट है और न ही कोई जर्मीसाइडल पदार्थ। यदि टैंक में यह टैबलेट डाली गई हैं तो इसे जल आपूर्ति व्यवस्था में अनधिकृत हस्तक्षेप माना जाएगा, जो लोगों की सेहत के लिए गंभीर खतरा हो सकता है।
खरीद प्रक्रिया पर भी उठे सवाल
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि ये टैबलेट नगर निगम की आधिकारिक खरीद प्रक्रिया के तहत नहीं ली गई थीं, बल्कि एक निजी दुकान से खरीदी गई थीं। इसके बाद मौखिक निर्देशों के आधार पर इन्हें टैंक में डाल दिया गया। मामले में निष्पक्ष पुलिस जांच की भी मांग की गई है।
टैंक की देखरेख में पांच लोग जिम्मेदार
कोर्ट को बताया गया कि जिस ओवरहेड टैंक से भागीरथपुरा क्षेत्र में पानी की आपूर्ति होती है, उसकी देखरेख के लिए पांच लोग जिम्मेदार हैं। इनमें तीन कर्मचारी नगर निगम के हैं, जबकि दो कर्मचारी निजी कंपनी रामकी इंडस्ट्रीज से जुड़े बताए गए हैं। सभी की भूमिका की जांच की जा रही है।
तीन स्रोतों से होती है शहर में पानी की सप्लाई
सुनवाई के दौरान यह भी जानकारी दी गई कि इंदौर शहर में पेयजल की आपूर्ति मुख्य रूप से नर्मदा जल योजना, यशवंत सागर बांध और बिलावली तालाब से होती है। इन स्रोतों से पानी को जल शोधन केंद्रों में साफ करने के बाद करीब 108 से 110 ओवरहेड टैंकों तक भेजा जाता है, जहां से पाइपलाइन के जरिए अलग-अलग इलाकों में सप्लाई की जाती है।
आखिरी टैंक में मिला दूषित पानी
कोर्ट में बताया गया कि जलदू से आने वाली लाइन में तीसरे आखिरी टैंक तक पानी मानक के अनुरूप साफ पाया गया, लेकिन उसी लाइन के दूसरे आखिरी और अंतिम टैंक में पानी दूषित मिला। यही टैंक भागीरथपुरा इलाके में पानी सप्लाई करता है, जिससे संदेह है कि गड़बड़ी टैंक स्तर पर ही हुई।
पहले भी जता चुका है कोर्ट नाराजगी
इससे पहले की सुनवाई में हाईकोर्ट ने शासन और नगर निगम की रिपोर्ट को “आई वॉश” बताते हुए नाराजगी जताई थी। अदालत ने कहा था कि स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है और यह मामला सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर स्थिति है।
जांच आयोग को 30 दिन का समय
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने रिटायर्ड जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में एकल सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया है। आयोग अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट अदालत में पेश कर चुका है। कोर्ट ने आयोग को 30 दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट देने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को होगी।