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Bhagwat responds to questions regarding the Sangh's registration, stating,
त्रिशूर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंजीयन को लेकर उठी बहस के बीच संघ प्रमुख मोहन भागवत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि संघ कोई गुप्त संगठन नहीं है और उसका कार्य दशकों से सार्वजनिक रूप से संचालित होता रहा है। उन्होंने संगठन के पंजीयन की मांग को अनावश्यक विवाद खड़ा करने का प्रयास बताया।
'हिंदू धर्म भी पंजीकृत नहीं, फिर भी समाज का हिस्सा'
त्रिशूर में आयोजित शताब्दी जनसंपर्क कार्यक्रम के दौरान भागवत ने कहा कि देश में अनेक सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाएं बिना औपचारिक पंजीयन के भी संचालित होती हैं। उनके अनुसार, केवल वे संस्थाएं पंजीयन कराती हैं जिन्हें शासकीय सहायता या विशेष वित्तीय सुविधाओं की आवश्यकता होती है।उन्होंने कहा कि संघ के स्वयंसेवक खुले मैदानों में शाखाएं लगाते हैं और समाज के बीच रहकर कार्य करते हैं। ऐसे में संगठन की पहचान या अस्तित्व को लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिए।
प्रतिबंधों का उल्लेख कर दिया जवाब
संघ प्रमुख ने कहा कि अतीत में संगठन पर विभिन्न अवसरों पर प्रतिबंध लगाए गए थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि शासन-प्रशासन संघ के अस्तित्व और गतिविधियों से भलीभांति परिचित है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि संघ ने वर्ष 1950 में अपना लिखित संविधान भी शासन के समक्ष प्रस्तुत किया था।
लिव-इन संबंधों पर उच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणी
इधर, चंडीगढ़ में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान लिव-इन संबंधों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। न्यायालय ने एक युवक-युवती की सुरक्षा याचिका निरस्त करते हुए कहा कि घर से भागकर साथ रहने के मामलों का प्रभाव परिवार की प्रतिष्ठा और अभिभावकों के सम्मान पर पड़ सकता है।
कुछ दिनों का साथ रहना पर्याप्त प्रमाण नहीं
न्यायमूर्ति संदीप मौदगिल ने कहा कि केवल कुछ समय तक साथ रहने भर से किसी संबंध को स्थायी सहजीवन संबंध नहीं माना जा सकता, विशेषकर तब जब दोनों पक्ष भविष्य में विवाह करने की बात स्वीकार कर चुके हों।न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में सुरक्षा प्रदान करना अप्रत्यक्ष रूप से संबंध को न्यायिक स्वीकृति देने जैसा माना जा सकता है, इसलिए प्रत्येक मामले का परीक्षण उसके तथ्यों के आधार पर किया जाना आवश्यक है।
विवाह को बताया सामाजिक और वैधानिक संस्था
उच्च न्यायालय ने अपने अवलोकन में कहा कि भारत विविध परंपराओं, मान्यताओं और सामाजिक मूल्यों वाला देश है। विवाह केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं बल्कि अधिकारों और दायित्वों से जुड़ा एक वैधानिक संबंध भी है। इसी कारण समाज में विवाह संस्था को विशेष सम्मान प्राप्त है।न्यायालय के अनुसार, आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव से कुछ क्षेत्रों में सहजीवन संबंधों को स्वीकार्यता मिल रही है, लेकिन भारतीय सामाजिक संरचना में विवाह का महत्व आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।