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CG News: Big relief for Jindal Steel, Chhattisgarh High Court stays recovery notice of Rs 153.55 crore
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने जिंदल स्टील लिमिटेड को बड़ी राहत देते हुए छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) द्वारा जारी 153.55 करोड़ रुपये की मांग नोटिस पर रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु की खंडपीठ ने सिंगल बेंच के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि मामले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया।
प्रभावी सुनवाई का अवसर नहीं मिला: हाईकोर्ट
अदालत ने कहा कि प्रारंभिक स्तर पर जिंदल स्टील को प्रभावी सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया, जिससे पूरी निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हुई। कोर्ट ने माना कि किसी पक्ष के अधिकारों और वित्तीय दायित्वों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले निर्णय से पहले उसे उचित अवसर दिया जाना आवश्यक है।
चार माह में नए सिरे से सुनवाई के निर्देश
हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग (CSERC) को निर्देश दिया है कि वह मामले की नए सिरे से सुनवाई कर चार माह के भीतर निर्णय दे। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि जिंदल स्टील को पर्याप्त और उचित सुनवाई का अवसर मिले। तब तक मांग नोटिस और उससे संबंधित किसी भी प्रकार की वसूली कार्रवाई पर रोक रहेगी।
2011 के बिजली खरीद समझौते से जुड़ा है विवाद
मामला 2 नवंबर 2011 को जिंदल स्टील और CSPDCL के बीच हुए पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA) से जुड़ा है। इसके तहत जिंदल ने रायगढ़ स्थित अपने कैप्टिव पावर प्लांट से वर्ष 2011-12 और 2012-13 में बिजली आपूर्ति की थी। CSPDCL ने बिजली प्राप्त कर निर्धारित दरों पर सभी बिलों का भुगतान भी कर दिया था।
टैरिफ आदेश के बाद जारी हुई थी वसूली नोटिस
बाद में CSPDCL ने राज्य विद्युत नियामक आयोग के समक्ष टैरिफ याचिका दायर की। आयोग ने 12 जून 2014 के आदेश में खरीदी गई बिजली को "नॉन-फर्म पावर" माना और कुछ लागतों को उपभोक्ताओं से वसूलने की अनुमति नहीं दी। इस निर्णय को 26 मई 2016 को अपीलीय विद्युत अधिकरण (APTEL) ने भी बरकरार रखा।
इन्हीं निष्कर्षों के आधार पर CSPDCL ने 7 जुलाई 2016 को जिंदल स्टील को 153.55 करोड़ रुपये वापस करने का नोटिस जारी किया। साथ ही कंपनी को शॉर्ट टर्म ओपन एक्सेस के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) देने से भी इनकार कर दिया गया, जिससे वह ऊर्जा एक्सचेंजों पर बिजली बेचने में असमर्थ हो गई।
जिंदल का तर्क: पक्षकार बनाए बिना थोप दी गई देनदारी
जिंदल स्टील की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल जैन, अभिमन्यु भंडारी और आशीष श्रीवास्तव ने दलील दी कि टैरिफ और ट्रू-अप आदेश उन कार्यवाहियों में पारित किए गए जिनमें कंपनी को पक्षकार ही नहीं बनाया गया था। उन्होंने कहा कि केवल सार्वजनिक सूचना जारी करना या किसी अधिकारी की अनौपचारिक उपस्थिति व्यक्तिगत नोटिस का विकल्प नहीं हो सकती, खासकर तब जब आदेश से किसी विशेष पक्ष पर भारी वित्तीय दायित्व डाला जा रहा हो।
CSPDCL ने सार्वजनिक सूचना को बताया पर्याप्त
वहीं CSPDCL ने तर्क दिया कि टैरिफ निर्धारण एक अर्ध-विधायी (Quasi-Legislative) प्रक्रिया है, जिसमें सार्वजनिक नोटिस पर्याप्त होता है। कंपनी ने यह भी कहा कि जिंदल को कार्यवाही की जानकारी थी, लेकिन उसने समय पर हस्तक्षेप नहीं किया।
हाईकोर्ट: जिंदल आवश्यक पक्षकार था
खंडपीठ ने CSPDCL के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि जिंदल इस विवाद में आवश्यक पक्षकार था क्योंकि आदेश का सीधा प्रभाव उसके संविदात्मक अधिकारों पर पड़ रहा था। अदालत ने कहा कि प्रारंभिक चरण में प्रभावी सुनवाई न मिलने से पूरी निर्णय प्रक्रिया दूषित हो सकती है।
न्यायसंगत सुनवाई से बेहतर निर्णय संभव
अपने आदेश में अदालत ने कहा कि प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर देने से सभी प्रासंगिक तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार किया जा सकता है, जिससे निष्पक्ष निर्णय लेने में मदद मिलती है। इससे बाद में न्यायिक समीक्षा के दौरान आदेशों के निरस्त होने की संभावना भी कम हो जाती है।