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Big relief for cancer patients... prices of 217 medicines reduced by more than 50%; find out who will benefit.
नई दिल्ली। कैंसर के इलाज पर होने वाले खर्च को कम करने की दिशा में सरकार के फैसले के बाद 543 दवा ब्रांड और पैक की नई कीमतों की सूची जारी की गई है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के मुताबिक, सूची में शामिल 397 ब्रांड-पैक के दाम घटाए गए है। इनमें 217 की कीमतों में 50% से अधिक की कटौती हुई है। वहीं, 97 ब्रांड-पैक 70% से ज्यादा और 50 ब्रांड-पैक 80% से अधिक सस्ते हुए है। पांच ब्रांड-पैक की कीमतों में 90% से ज्यादा की कमी आई है।सबसे बड़ी कटौती पैलबोसिक्लिब की एक दवा के पैक में दर्ज की गई है। 21 कैप्सूल का पैक, जिसकी कीमत पहले 40,421 रुपये थी, अब 2,720 रुपये में मिलेगा। हालांकि, सूची में शामिल 146 ब्रांड-पैक के दाम में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इनमें पेटेंट वाली महंगी दवाएं भी शामिल है।सरकार ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाले 137 दवा सॉल्ट के ट्रेड मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के 30% तक सीमित करने का आदेश दिया था। इसके बाद दवा कंपनियों ने संशोधित कीमतों की जानकारी दी है। नई दरें 9 नवंबर से लागू होंगी।
ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क की सह-संयोजक मालिनी ऐसोला के अनुसार, कीमतों में आई बड़ी गिरावट से संकेत मिलता है कि जेनेरिक दवाओं की बिक्री में मरीजों से काफी अधिक मार्जिन लिया जा रहा था। हालांकि, उनका मानना है कि सरकार की ट्रेड मार्जिन रैशनलाइजेशन (टीएमआर) नीति में कुछ महत्वपूर्ण कमियां है।
टीएमआर फॉर्मूले में स्टॉकिस्ट तक दवा पहुंचने के स्तर पर 42.8% तक मार्जिन की गुंजाइश है। महंगी दवाओं में यह प्रतिशत रकम के हिसाब से काफी बड़ा हो सकता है। कुछ दवाओं की आपूर्ति में बिचौलियों की संख्या कम होती है, जबकि कुछ सीधे अस्पतालों को बेची जाती है। ऐसी स्थिति में सप्लाई चेन के कुछ हिस्सों को अधिक मुनाफा मिल सकता है। पेटेंट वाली दवाओं की कीमतों में बदलाव सीमित रहने की यह एक वजह हो सकती है।
मरीज सहायता कार्यक्रमों के तहत मुफ्त दी जाने वाली दवाओं को टीएमआर की गणना में शामिल नहीं किया गया। मालिनी ऐसोला के मुताबिक, यदि इन दवाओं को भी नीति के दायरे में रखा जाता, तो पेटेंट वाली कुछ दवाओं की कीमतों में कमी की गुंजाइश बन सकती थी।
दवा मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीओ) के तहत निर्धारित दवाओं पर लागू 16% मार्जिन सीमा यदि कैंसर की दवाओं पर भी लागू होती, तो मरीजों को और अधिक राहत मिल सकती थी। वर्ष 2019 में मार्जिन सीमा लागू की गई दवाओं के दामों में हुई बड़ी कटौती भी इस बात की ओर इशारा करती है कि पहले कीमतों में काफी अधिक मार्जिन शामिल था।
मालिनी ऐसोला ने एनपीपीए के पास सप्लाई चेन में कीमतों से जुड़ा पर्याप्त और ठोस डेटा नहीं होने पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि कंपनियों को कीमतें लागू करने और उनकी जानकारी खुद उपलब्ध कराने की छूट मिलने से स्वतंत्र जांच की जरूरत और बढ़ जाती है।
एमसी मिश्र, पूर्व निदेशक, एमा के अनुसार, दवाओं पर मार्जिन तय करते समय संतुलित दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। मार्जिन इतना अधिक नहीं होना चाहिए कि मरीजों को महंगी दवाएं खरीदनी पड़ें। दूसरी ओर, इसे जरूरत से ज्यादा कम करने पर कंपनियां दवाओं की आपूर्ति रोक सकती है या बाजार में उपलब्धता घटा सकती है।उन्होंने दवाओं की सप्लाई चेन में मार्जिन की नियमित और प्रभावी जांच की जरूरत बताई। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में 13 हजार रुपये के इंजेक्शन की कीमत एक लाख रुपये से अधिक होने का मामला भी चर्चा में आया था। यह स्थिति आपूर्ति व्यवस्था में कीमतों की निगरानी की अहमियत को दर्शाती है।पेटेंट वाली दवाओं के मामले में विशेषज्ञ ने अलग तरह की व्यावहारिक चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया। ऐसी दवाएं नई तकनीक और पेटेंट अधिकारों से जुड़ी होती है। कीमतों में कटौती का दबाव बढ़ने पर कंपनियां भारत में इनकी आपूर्ति कम कर सकती है या बंद करने का फैसला ले सकती है। इसलिए मरीजों को राहत देने के साथ दवाओं की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना भी जरूरी है।