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Chhattisgarh Police in action mode regarding new laws, digital evidence, and cybercrime.
रायपुर। नए आपराधिक कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन और तेजी से बदल रहे साइबर अपराधों से निपटने के लिए छत्तीसगढ़ पुलिस ने अपनी कार्यप्रणाली को तकनीक आधारित बनाने की दिशा में कदम तेज कर दिए हैं। अब पुलिस जांच में डिजिटल साक्ष्य, ऑनलाइन प्रक्रिया और आधुनिक तकनीकी संसाधनों का इस्तेमाल बढ़ाया जाएगा। एफआईआर दर्ज होने से लेकर चार्जशीट अदालत में पहुंचने तक की पूरी प्रक्रिया को डिजिटल सिस्टम से जोड़ने की तैयारी है। इसी के साथ साइबर ठगी के मामलों में त्वरित कार्रवाई के लिए करीब 300 पुलिस अधिकारियों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया।
पुलिस मुख्यालय में नए आपराधिक कानूनों के क्रियान्वयन की समीक्षा के दौरान उप मुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री विजय शर्मा ने अधिकारियों को तकनीकी व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए। योजना के तहत सभी थानों को नेशनल ऑटोमेटेड फिंगरप्रिंट आइडेंटिफिकेशन सिस्टम और ई-साक्ष्य के बेहतर इस्तेमाल के लिए तैयार किया जा रहा है।नई व्यवस्था में एफआईआर के बाद विवेचना से लेकर चार्जशीट तैयार करने और उसे न्यायालय में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया को डिजिटल माध्यम से संचालित किया जाएगा। ई-समन की तामील और ऑनलाइन चार्जशीट पेश करने की व्यवस्था को भी प्रभावी बनाया जाएगा। इससे पुलिस जांच में लगने वाला समय कम होने और न्यायिक प्रक्रिया तक दस्तावेज तेजी से पहुंचने की उम्मीद है।
पुलिस अब अपराध की जांच में डिजिटल साक्ष्यों को अधिक व्यवस्थित तरीके से जुटाने और सुरक्षित रखने पर जोर दे रही है। फिंगरप्रिंट पहचान प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और अन्य डिजिटल प्रमाणों को जांच प्रक्रिया का अहम हिस्सा बनाया जा रहा है।अधिकारियों के मुताबिक नए आपराधिक कानूनों के तहत जांच प्रक्रिया में तकनीक की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। इसी वजह से पुलिसकर्मियों को केवल कानूनी प्रावधानों की जानकारी देने के बजाय तकनीकी रूप से भी सक्षम बनाने की कोशिश की जा रही है।
इसी कड़ी में चंदखुरी स्थित नेताजी सुभाष चंद्र बोस राज्य पुलिस अकादमी में वित्तीय अपराध और त्वरित पुलिस प्रतिक्रिया विषय पर कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें प्रदेश के विभिन्न जिलों से करीब 300 पुलिस अधिकारी शामिल हुए।कार्यशाला में निवेश के नाम पर ठगी, ऑनलाइन लोन फ्रॉड, फर्जी केवाईसी, यूपीआई से होने वाले अपराध, क्रिप्टोकरेंसी और अन्य डिजिटल धोखाधड़ी के मामलों की जांच पर प्रशिक्षण दिया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि साइबर अपराधी रकम को कुछ ही मिनटों में कई खातों के जरिए आगे भेज देते हैं। ऐसे में शुरुआती समय में पुलिस की कार्रवाई बेहद निर्णायक हो सकती है।
प्रशिक्षण के दौरान साइबर और वित्तीय ठगी के मामलों में गोल्डन आवर की अहमियत बताई गई। अधिकारियों को बैंक खातों को तत्काल फ्रीज कराने, संदिग्ध लेनदेन का पता लगाने और डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित करने की प्रक्रिया समझाई गई।विशेषज्ञों ने कहा कि जांच केवल ठगी की रकम तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। रकम किस खाते में गई, वहां से आगे कहां भेजी गई और इसके पीछे कौन सा डिजिटल नेटवर्क सक्रिय है, इसकी पूरी कड़ी तलाशना जरूरी है। इसके लिए पीड़ित के मोबाइल या अन्य डिवाइस, डिजिटल फुटप्रिंट, बैंकिंग ट्रांजेक्शन और संबंधित खातों के बीच संबंधों की जांच महत्वपूर्ण होगी।
साइबर अपराधों की जांच में पुलिस, बैंक, फिनटेक कंपनियों और भुगतान सेवा प्रदाताओं के बीच तेज समन्वय पर भी जोर दिया गया। अधिकारियों को बताया गया कि शिकायत मिलते ही संबंधित एजेंसियों को सूचना देकर संदिग्ध लेनदेन रोकने की दिशा में काम करना चाहिए।
पुलिस मुख्यालय की बैठक में नेशनल क्रिमिनल लॉ इम्प्लीमेंटेशन डैशबोर्ड के जरिए नए आपराधिक कानूनों के क्रियान्वयन की समीक्षा भी की गई। इस डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अमल की प्रगति पर नजर रखी जा रही है।कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ पुलिस अब पारंपरिक जांच व्यवस्था के साथ डिजिटल तकनीक को जोड़कर काम करने की तैयारी में है। एक ओर थाने से अदालत तक आपराधिक मामलों की प्रक्रिया को ऑनलाइन और तकनीक आधारित बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर साइबर अपराधियों के बदलते तौर तरीकों का मुकाबला करने के लिए पुलिस अधिकारियों को आधुनिक जांच तकनीकों में प्रशिक्षित किया जा रहा है।