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Chhattisgarh: Tiger population rising rapidly in Chhattisgarh; numbers increased from 18 to 35 in four years.
रायपुर। छत्तीसगढ़ के जंगल बाघों के लिए लगातार अनुकूल होते जा रहे हैं। मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और ओडिशा से बाघों के प्रदेश के जंगलों में आने के साथ यहां इनका कुनबा भी बढ़ रहा है। वर्ष 2022 में राज्य में जहां 18 बाघ दर्ज किए गए थे, वहीं वर्ष 2026 में इनकी संख्या बढ़कर 35 हो गई है। यानी चार साल के भीतर प्रदेश में बाघों की संख्या करीब दोगुनी हो गई है।
वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप ने मंगलवार को छत्तीसगढ़ संवाद में आयोजित पत्रकार वार्ता में विभाग की उपलब्धियां साझा कीं। उन्होंने कहा कि सरकार का फोकस वन संरक्षण के साथ-साथ वनवासियों और ग्रामीणों की आय बढ़ाने पर भी है।
वन विभाग के मुताबिक प्रदेश में बाघों के लिए अनुकूल पर्यावरणीय परिस्थितियां तैयार होने और बाघों से जुड़े अपराधों में कमी आने से इनकी संख्या में वृद्धि हुई है। पड़ोसी राज्यों से बाघों का छत्तीसगढ़ के जंगलों में आना भी इस बढ़ोतरी का अहम कारण माना जा रहा है।
मंत्री केदार कश्यप ने बताया कि बस्तर के माओवादी प्रभावित सात जिलों में सुरक्षा व्यवस्था बेहतर होने के बाद वन विभाग की गतिविधियां दोबारा शुरू की जा रही हैं। इमारती लकड़ी और बांस विदोहन के जरिए करीब 21.67 लाख मानव-दिवस रोजगार मिलने का अनुमान है।
किसान वृक्ष मित्र योजना के तहत पिछले दो वर्षों में 36,896 किसानों की 62,441 एकड़ जमीन पर 3.67 करोड़ पौधे लगाए गए हैं। वहीं ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत वर्ष 2024 में 3.50 करोड़, वर्ष 2025 में 3.55 करोड़ और वर्ष 2026 में अब तक 2.23 करोड़ पौधे लगाए या वितरित किए गए हैं।
वर्ष 2025 में प्रदेश के 11.44 लाख परिवारों ने 13.85 लाख मानक बोरा तेंदूपत्ता संग्रह किया। इसके एवज में उन्हें 757 करोड़ रुपये का ऑनलाइन भुगतान किया गया। इसके अलावा 7.14 लाख संग्राहकों को 153 करोड़ रुपये प्रोत्साहन राशि और 8,533 विद्यार्थियों को 12.07 करोड़ रुपये छात्रवृत्ति दी गई।
राजमोहिनी देवी सुरक्षा योजना के तहत 1,862 मामलों में 26.08 करोड़ रुपये की सहायता दी गई।
वन्यजीव संरक्षण के मोर्चे पर भी राज्य में सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। बारनवापारा में कृष्णमृगों की संख्या 77 से बढ़कर 200 से अधिक हो गई है। वहीं हाथियों के कारण होने वाली जनहानि में भी कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2022-23 में हाथियों से जनहानि के 76 मामले सामने आए थे, जो वर्ष 2025-26 में घटकर 53 रह गए।
छत्तीसगढ़ में 240 प्राकृतिक पर्यटन केंद्र विकसित किए गए हैं, जिनमें 50 से अधिक केंद्र स्वावलंबी हो चुके हैं। बस्तर के धुड़मारास में सालाना 38,391 पर्यटकों के पहुंचने की जानकारी दी गई। इसके अलावा 572 देवगुड़ियों के निर्माण और जीर्णोद्धार पर 19.05 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं।
वन विभाग जहां वनवासियों और वन्य गांवों में रहने वाले लोगों को रोजगार देने की बात कर रहा है, वहीं विभाग में जंगल से जुड़े कामों की आउटसोर्सिंग की तैयारी को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक निर्माण कार्य, तालाब खुदाई, रपटा निर्माण, कूप कटाई, फेंसिंग, प्लांटेशन और वृक्षारोपण जैसे काम पहले वन विभाग स्थानीय लोगों से करवाता था। इससे वन्य क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को नियमित रोजगार मिलता था और वन विभाग के कर्मचारियों के साथ उनका संपर्क भी बना रहता था।
अब इन कामों को ठेके के जरिए आउटसोर्स करने की तैयारी की जा रही है। आशंका जताई जा रही है कि यदि ठेकेदार बाहरी श्रमिकों को लेकर आते हैं तो स्थानीय लोगों के रोजगार के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।
वन क्षेत्रों में स्थानीय लोगों और वन विभाग के बीच बेहतर तालमेल का फायदा वन्यजीव अपराधों की रोकथाम, जंगल में आग पर नियंत्रण और अन्य गतिविधियों की निगरानी में भी मिलता रहा है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर कम होने से विभाग और ग्रामीणों के बीच संपर्क प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
आउटसोर्सिंग को लेकर वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि फिलहाल इसका प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि काम की गुणवत्ता और अन्य पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ठेके के संबंध में निर्णय लिया जाएगा।
इस तरह एक ओर छत्तीसगढ़ में बाघों की बढ़ती संख्या, वन्यजीव संरक्षण और पर्यटन को लेकर वन विभाग उपलब्धियां गिना रहा है, वहीं दूसरी ओर जंगल आधारित रोजगार को आउटसोर्स करने की संभावित योजना स्थानीय रोजगार और वन विभाग-ग्रामीणों के बीच समन्वय को लेकर नई बहस खड़ी कर सकती है।