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Controversy over foreign exchange reserves and gold reserves, RBI calls Bloomberg report misleading
नई दिल्ली। भारत के विदेशी मुद्रा भंडार और स्वर्ण भंडार को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। अमेरिकी मीडिया संस्थान ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मई 2026 में रुपए की गिरती कीमत को संभालने के लिए बड़ी मात्रा में सोना बेचा है। रिपोर्ट सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है। हालांकि आरबीआई और वित्त मंत्रालय ने इन दावों को पूरी तरह गलत और भ्रामक बताते हुए खारिज कर दिया है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई ने मई 2026 के आखिरी दो सप्ताह में करीब 12 अरब डॉलर यानी लगभग एक लाख करोड़ रुपये मूल्य का सोना बेचा। रिपोर्ट में दावा किया गया कि यह मात्रा लगभग 200 टन सोने के बराबर थी और इसका इस्तेमाल गिरते रुपए को सहारा देने तथा डॉलर जैसी तरल विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए किया गया।
आरबीआई ने रिपोर्ट का खंडन करते हुए स्पष्ट किया कि देश के पास मौजूद भौतिक सोने के भंडार में एक ग्राम की भी कमी नहीं आई है। केंद्रीय बैंक के मुताबिक 31 मार्च 2025 तक भारत के पास 879.58 मीट्रिक टन सोना था, जो 31 मार्च 2026 तक बढ़कर 880.52 मीट्रिक टन हो गया।
आरबीआई ने कहा कि वैश्विक बाजार में सोने की कीमत और डॉलर-रुपए की विनिमय दर में उतार-चढ़ाव के कारण गोल्ड रिजर्व की वैल्यू बदलती रहती है। संभवतः इसी बदलाव को ब्लूमबर्ग के अर्थशास्त्रियों ने गलत तरीके से समझ लिया।
आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 691.11 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। वहीं गोल्ड रिजर्व की कुल वैल्यू भी बढ़कर 115.40 अरब डॉलर हो गई है। आरबीआई ने यह भी बताया कि पिछले तीन वर्षों में भारत ने विदेशों में रखे 378 मीट्रिक टन से अधिक सोने को वापस देश की तिजोरियों में ट्रांसफर किया है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी छवि बचाने के लिए आरबीआई से देश का सोना बिकवा रहे हैं।
वहीं आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने भी केंद्र सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि “मोदी जी तो कभी भी झोला उठाकर चले जाएंगे, लेकिन हमें तो यहीं रहना है।”
भारत के आर्थिक इतिहास में इससे पहले भी सोने को लेकर बड़े फैसले लिए जा चुके हैं। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अपील पर लोगों और मंदिरों ने बड़ी मात्रा में सोना दान किया था।
इसके बाद 1991 के आर्थिक संकट में, जब देश के पास केवल दो सप्ताह के आयात लायक विदेशी मुद्रा बची थी, तब तत्कालीन चंद्रशेखर और पीवी नरसिंह राव सरकार ने 67 टन सोना गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा जुटाई थी। इसमें 20 टन सोना स्विट्जरलैंड और 47 टन बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास गिरवी रखा गया था।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक बाजार में बढ़ती अनिश्चितता, डॉलर की मजबूती और अंतरराष्ट्रीय तनावों के बीच भारत का विदेशी मुद्रा और स्वर्ण भंडार निवेशकों के भरोसे के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में आरबीआई के आंकड़ों और उसकी रणनीति पर अब देश और दुनिया की नजर बनी हुई है।