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Delhi High Court's big decision: Mere misbehavior is not a crime under the SC-ST Act
दिल्ली दिल्ली विश्वविद्यालय की एक महिला प्रोफेसर के खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC-ST) अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज एफआईआर को दिल्ली हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया है।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने स्पष्ट कहा कि हर तरह का विवाद या दुर्व्यवहार अपने आप में SC-ST एक्ट के तहत अपराध नहीं माना जा सकता, जब तक उसमें जाति आधारित अपमान की मंशा साबित न हो।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि SC-ST एक्ट की धारा 3 तभी लागू होती है जब यह स्पष्ट हो कि आरोपी ने पीड़ित को उसकी जाति के कारण अपमानित करने के उद्देश्य से कार्य किया हो।
अदालत ने यह भी कहा कि केवल यह तथ्य कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति से है और उसके साथ विवाद या दुर्व्यवहार हुआ, अपने आप में इस कानून के तहत अपराध नहीं बनाता।
मामला किस बात से जुड़ा था
यह विवाद दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज में अगस्त 2021 में हुई एक विभागीय बैठक से जुड़ा है।
बैठक के दौरान नेशनल असेसमेंट एंड एक्रेडिटेशन काउंसिल से संबंधित मिनट्स पर हस्ताक्षर को लेकर दो प्रोफेसरों के बीच कहासुनी हो गई थी। आरोप है कि इस दौरान धक्का-मुक्की और कागज फाड़ने जैसी घटनाएं भी हुईं।
शिकायत और जांच में अंतर
शिकायत करने वाली एसोसिएट प्रोफेसर ने शुरुआत में पुलिस को दी गई शिकायत में किसी जातिगत टिप्पणी का उल्लेख नहीं किया था।
बाद में दी गई शिकायत में जातिवादी टिप्पणी का दावा किया गया, लेकिन अदालत ने पाया कि उसमें स्पष्ट और ठोस तथ्य नहीं थे, बल्कि सामान्य और अस्पष्ट आरोप ही दर्ज किए गए थे।