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Electricity companies vs kindness to outsiders and cruelty to loved ones.......Chaitanya Bhatt
भोपाल। कुकिंग गैस की किल्लत झेल रहे लोगों के बिजली से चलने वाले इंडक्शन कुकर उपयोग करने के इरादों को भी झटका लगा है। प्रदेश में विद्युत वितरण कंपनियों के 10.19 % टैरिफ वृद्धि के प्रस्ताव पर नियामक आयोग द्वारा 4.80 % की बढ़ोतरी को मंजूरी दिए जाने से घरेलू, औद्योगिक और कृषि सहित सभी श्रेणियों के लिए बिजली महंगी हो रही है। 150 यूनिट तक की खपत पर दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी अभी जारी रहेगी।अपने कुप्रबंधन का खामियाजा आम उपभोक्ताओं से वसूलने वाली विद्युत वितरण कंपनिया पावरी एक्सचेंज के माध्यम से 3.81 रुपए प्रति यूनिट के हिसाब से बाहर बेच रही हैं दूसरी ओर अपने प्रदेश के उपभोक्ताओं को वही बिजली सात से आठ रुपए प्रति यूनिट के हिसाब से बेची जा रही है विद्युत कंपनियों की इस मनमानी पर ये कहा जा सकता है
"गैरों पे करम अपनों पे सितम"
इधर स्मार्ट मीटरिंग से "टाइम आफ डे टैरिफ" भी अस्तित्व में आ गया है। विद्युत वितरण कंपनियों द्वारा खरीदी जाने वाली बिजली के लिए एकीकृत इनर्जी एक्सचेंज व्यवस्था है। इस एक्सचेंज पर बिजली की दरें मांग और सप्लाई के आधार पर बदलती रहती हैं। पहले खरीदी गई बिजली की औसत दर के हिसाब से बिक्री दरें निर्धारित होती थीं। स्मार्ट मीटरिंग से संभव हो गया है कि उपभोक्ताओं से उपयोग के समय एक्सचेंज पर लागू दर के ही हिसाब से कीमत वसूली जा सके। एक तरह से यह व्यवस्था उपभोक्ताओं के हित में है जो अपनी आवश्यकता को उस समय लागू दरों से नियंत्रित कर सकते हैं। कंपनियां भी उपभोक्ताओं को इसका लाभ दे सकती हैं जैसे नई टैरिफ व्यवस्था में इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग के लिए सुबह 9 से शाम 5 के बीच बिजली उपयोग पर 20% की छूट मिलेगी जबकि शाम 6 से रात 10 बजे के बीच अतिरिक्त शुल्क लगेगा।
लेकिन बढ़ोतरी के प्रस्ताव पर गंभीर सवाल भी उठते हैं। बिजली कंपनियों में वित्तीय कुप्रबंधन चरम पर है। 4200 करोड़ रुपए से अधिक के संचित घाटे ने वितरण कंपनियों की आर्थिक हालत खराब कर रखी है। कंपनियों के अनुसार पिछले सालों में उनके 3,451 करोड़ रुपए के बढ़ोतरी प्रस्तावों को आयोग द्वारा मंजूर नहीं किए जाने से स्थिति और बिगड़ी है। बिजली खरीदी पर लगभग 300 करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च हुआ है। पिछले साल केंद्र ने विद्युत उत्पादन में लगने वाले कोयले पर 400 रुपए प्रति टन जीएसटी सेस हटा दिया था।
एक्सपर्ट्स के अनुसार इससे प्रति यूनिट होने वाली 17 से 18 पैसे की कमी का फायदा उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच रहा है। स्मार्ट मीटर लगाते समय दावा था कि इनका खर्च उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जाएगा। स्मार्ट मीटर से बिजली चोरी रुकेगी, लाइन लॉस कम होगा और बचत से ही इनकी लागत निकल जाएगी। यह सारे दावे हवा हो गए हैं। अब स्मार्ट मीटर लगाने पर हुआ 820 करोड़ खर्च कंपनियां उपभोक्ताओं से वसूलना चाहती हैं। पिछले विधानसभा चुनाव से पहले सरकार ने फैसला लिया था कि 31 अगस्त 2023 तक के घरेलू उपभोक्ताओं के बढ़े हुए बिजली बिल बकाया की लगभग 4800 करोड़ की वसूली रुकवा दी जाए। वादा था कि इसकी भरपाई सरकार खुद करेगी यानी वितरण कंपनियों को सरकार से पैसे मिलेंगे जो अभी तक नहीं मिले।
ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर कह चुके हैं कि सरकार का पूरा प्रयास है कि उपभोक्ताओं पर बिजली दरों में बढ़ोतरी का अतिरिक्त बोझ न पड़े। उन्होंने यह भी दावा किया था कि 2028 तक प्रदेश की बिजली कंपनियां घाटे से उबर कर आर्थिक रूप से मजबूत हो जाएंगी। बिजली को और सस्ता कैसे किया जाएगा सवाल पर मंत्री जी का कहना था, प्रदेश के कुल 1 करोड़ 35 लाख बिजली उपभोक्ताओं में से करीब एक करोड़ उपभोक्ता अटल गृह ज्योति योजना के तहत सिर्फ 100 रुपए में बिजली पा रहे हैं। ऐसे में बिजली को और सस्ता कैसे किया जा सकता है ? स्पष्ट है, बिजली क्षेत्र में निर्णयों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त कर पेशेवर और स्वतंत्र रूप से कार्य करने का उद्देश्य सरकारी प्राथमिकता नहीं है।
2003 से लागू विद्युत सुधारों के उद्देश्यों में बिजली दरों को युक्तिसंगत बनाने, बिजली बोर्डों के खराब वित्तीय प्रदर्शन को सुधारने , राजनीतिकरण खत्म करने और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा प्रमुख थे। ढाई दशकों के बावजूद यह उद्देश्य विशेषत: उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा अधूरे ही हैं। दर निर्धारण को लेकर मनमानी जहां की तहां है। अनुभवी नियमित कर्मचारियों की कमी के चलते मैदानी व्यवस्था संविदा और ठेका कर्मियों पर निर्भर है। फलस्वरूप शिकायत निवारण और बेहतर गुणवत्ता की उपभोक्ता सेवा सपना बन कर रह गई है। जरा से हवा पानी में सप्लाई घंटों बाधित रहती है। करोड़ों की केंद्रीय सहायता के बावजूद वितरण कंपनियों आर्थिक रूप से बदहाल हैं।
नियामक आयोग के सरकारी नियंत्रण से निकल कर स्वतंत्र रूप से कार्य करने का ध्येय किताबी साबित हो रहा है। मूल अवधारणा के अनुसार आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के चयन में निष्पक्षता और तकनीकी विशेषज्ञता महत्वपूर्ण थी। मगर शुरुआती दौर में अध्यक्ष के रूप में निवृतमान हाईकोर्ट जज का चयन अपवाद बन कर रह गया। उसके बाद यह पद शीर्ष स्तर के सेवा निवृत्त अफसरों के पुनर्वास का माध्यम बन कर रह गया है। पूरा जीवन सरकारी सेवा में गुजारने वाले से सरकार और सरकारी कंपनी के विपरीत उपभोक्ता के हक में निर्णय लेने की प्रत्याशा मृग मरीचिका ही है। विद्युत वितरण व्यवस्था अभी भी पेशेवर नहीं बल्कि राजनीतिक नफे नुकसान और मुफ्त रेवड़ियों पर निर्धारित होती है। इस कुप्रबंधन की पूरी सजा सब्सिडी विहीन उपभोक्ता और प्रदेश का आर्थिक विकास झेल रहा है। जाहिर है, उपभोक्ताओं की इन श्रेणियों के लिए आने वाला समय और भी कठिन साबित होने वाला है।