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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राज्य में मतांतरण को लेकर चल रहे विवाद के बीच एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की सिंगल बेंच ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को अपने निजी आवास में शांतिपूर्ण प्रार्थना सभा आयोजित करने का पूर्ण अधिकार है और इसके लिए पूर्व अनुमति लेना आवश्यक नहीं है।
अदालत ने यह भी कहा कि केवल प्रार्थना सभा आयोजित करने के आधार पर पुलिस द्वारा हस्तक्षेप करना उचित नहीं है। साथ ही, पुलिस को निर्देश दिया गया है कि याचिकाकर्ताओं को अनावश्यक रूप से परेशान न किया जाए।
मामला जांजगीर-चांपा जिले के नवागढ़ थाना क्षेत्र के ग्राम गोधन का है। यहां के निवासी बद्री प्रसाद साहू और राजकुमार साहू ने पुलिस द्वारा जारी नोटिस को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। पुलिस बार-बार नोटिस जारी कर उनके घर में आयोजित प्रार्थना सभा को रोकने का प्रयास कर रही थी।
हाई कोर्ट ने 18 अक्टूबर 2025, 22 नवंबर 2025 और 1 फरवरी 2026 को जारी सभी नोटिसों को निरस्त कर दिया।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, वे अपने निजी मकान की पहली मंजिल पर वर्ष 2016 से ईसाई समुदाय के लोगों के लिए प्रार्थना सभा आयोजित कर रहे हैं। उनके वकील ने कोर्ट को बताया कि इन सभाओं में कोई अवैध गतिविधि या शांति भंग जैसी स्थिति नहीं होती।
राज्य सरकार की ओर से पेश शासकीय अधिवक्ता ने अदालत में कहा कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं और प्रार्थना सभा के लिए पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी। उन्होंने जवाब दाखिल करने के लिए समय भी मांगा।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि निजी संपत्ति में शांतिपूर्ण धार्मिक गतिविधि पर कोई प्रतिबंध नहीं है। हालांकि, यदि प्रार्थना सभा के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती है या कोई उल्लंघन होता है, तो प्रशासन नियमानुसार कार्रवाई कर सकता है। अदालत ने साफ किया कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों में बिना उचित कारण हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।