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Entertainment: Aamir Khan's 'Rang De Basanti' completes 20 years; as relevant today as it was then
मुंबई। बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान की आइकॉनिक फिल्म ‘रंग दे बसंती’ को रिलीज़ हुए 20 साल पूरे हो गए हैं, लेकिन इसका असर आज भी दर्शकों के दिल और दिमाग पर उतना ही गहरा है। साल 2006 में आई इस फिल्म ने न सिर्फ सामाजिक सिनेमा को नई दिशा दी, बल्कि युवाओं के बीच देशभक्ति को देखने और समझने का नजरिया भी बदल दिया। आमिर खान की सधी हुई अदाकारी, प्रभावशाली कहानी और ए.आर. रहमान का सदाबहार संगीत इसे आज भी खास बनाता है।
फिल्म में आमिर खान ने दलजीत ‘डीजे’ सिंह का किरदार निभाया, जो मस्तीभरे जीवन से निकलकर बदलाव और जिम्मेदारी की राह पर चलता है। उनके किरदार का यह ट्रांसफॉर्मेशन बेहद सहज और प्रभावी है। आमिर की शांत लेकिन गहराई वाली एक्टिंग दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ती है और लंबे समय तक याद रहती है।

रंग दे बसंती सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक सोच है। यह कहानी दिखाती है कि देशभक्ति केवल नारे लगाने तक सीमित नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने और सही कदम उठाने में है। भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों की सोच को वर्तमान से जोड़कर फिल्म युवाओं को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है।
फिल्म में युवाओं की दोस्ती, मस्ती, भावनात्मक टकराव और भीतर चल रहे संघर्ष को बेहद ईमानदारी से दिखाया गया है। दोस्तों के रिश्ते और उनका विद्रोह बनावटी नहीं, बल्कि बदलाव की सच्ची चाह से उपजा हुआ नजर आता है, जिससे दर्शक खुद को कहानी से जोड़ पाते हैं।
फिल्म का संगीत आज भी उतना ही असरदार है। “रंग दे बसंती”, “लुका छुप्पी”, “पाठशाला”, “रूबरू” और “खून चला” जैसे गाने 20 साल बाद भी दिल को छू जाते हैं। ये गीत भावनाओं, देशभक्ति और युवावस्था की यादों को ताजा कर देते हैं।
दो दशक बीत जाने के बाद भी फिल्म की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। सिस्टम पर सवाल उठाना, सामाजिक जिम्मेदारी निभाना और बदलाव के लिए खड़ा होना ये संदेश आज भी उतने ही अहम हैं। रंग दे बसंती यह याद दिलाती है कि असली बदलाव जागरूकता, साहस और सामूहिक प्रयास से ही संभव है। 20 साल बाद भी रंग दे बसंती सिर्फ देखी नहीं जाती, बल्कि महसूस की जाती है और यही इसे एक कालजयी फिल्म बनाती है।
