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Excess gratuity amount must now be returned... High Court clarifies that an error in government payment does not confer a right upon the employee.
बिलासपुर। सरकारी विभाग से सेवानिवृत्ति के बाद मिली अतिरिक्त ग्रेच्युटी की रकम को अपने पास रखना कर्मचारियों का कानूनी अधिकार नहीं है। विभागीय स्तर पर हुई भुगतान संबंधी गलती का लाभ लेकर सरकारी धन पर दावा नहीं किया जा सकता। बिलासपुर हाई कोर्ट ने मुंगेली शिक्षा विभाग के दो सेवानिवृत्त शिक्षकों से जुड़े मामले में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने शंकर दास धिरही और कालीराम कुरें की याचिकाएं खारिज करते हुए विभाग द्वारा जारी रिकवरी आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पात्रता से अधिक भुगतान होने की स्थिति में अतिरिक्त राशि की वसूली सामान्य नियम है। राहत केवल विशेष और असाधारण परिस्थितियों में ही दी जा सकती है।
मुंगेली शिक्षा विभाग में कार्यरत रहे शंकर दास धिरही और कालीराम कुरें को उनकी पात्रता से अधिक ग्रेच्युटी का भुगतान कर दिया गया था। कालीराम कुरें 30 जून 2024 को जबकि शंकर दास धिरही 31 जनवरी 2025 को सेवानिवृत्त हुए थे।बाद में विभाग ने भुगतान की जांच की तो अतिरिक्त राशि का मामला सामने आया। इसके बाद 5 जून 2026 को दोनों से अतिरिक्त भुगतान की रकम वापस लेने का आदेश जारी किया गया। सेवानिवृत्त शिक्षकों ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए वसूली रोकने की मांग की थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट के पंजाब राज्य बनाम रफीक मसीह मामले में वर्ष 2015 में दिए गए फैसले का हवाला दिया गया। उनका तर्क था कि यदि अतिरिक्त भुगतान विभाग की गलती से हुआ है तो कुछ परिस्थितियों में सेवानिवृत्त कर्मचारी से उसकी वसूली नहीं की जा सकती।दोनों शिक्षकों ने इसी आधार पर कहा कि विभागीय गलती के कारण मिली अतिरिक्त ग्रेच्युटी की रकम उनसे वापस लेना उचित नहीं है।हालांकि हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि रफीक मसीह के फैसले में बताई गई परिस्थितियां हर मामले में स्वत: लागू नहीं होतीं। किसी कर्मचारी को केवल विभागीय गलती के आधार पर सरकारी धन अपने पास रखने का अधिकार नहीं मिल जाता।
अदालत ने माना कि जब किसी कर्मचारी को उसकी वास्तविक पात्रता से अधिक ग्रेच्युटी का भुगतान मिलता है, तो कर्मचारी की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह विभाग को इस अतिरिक्त भुगतान की जानकारी दे।कोर्ट ने इसी आधार पर दोनों मामलों में वसूली के आदेश को सही माना और दोनों याचिकाएं निरस्त कर दीं। इस फैसले से यह स्पष्ट संकेत मिला है कि सरकारी भुगतान में हुई गलती से कर्मचारी को अतिरिक्त रकम पर स्थायी अधिकार हासिल नहीं हो जाता।