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From sulphur to tribal rights... why has this issue heated up Chhattisgarh's politics, and what has brought the Congress and the government into a face-off?
रायपुर। किसानों के लिए जरूरी उर्वरकों की उपलब्धता और उनकी आपूर्ति व्यवस्था को लेकर सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने लोकसभा में केंद्र सरकार का ध्यान सल्फर की जरूरत और उपलब्धता की ओर खींचा। उनके सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने बताया कि कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले फॉस्फेट और पोटाश आधारित उर्वरकों के लिए देश को हर साल करीब 30 से 35 लाख मीट्रिक टन सल्फर की आवश्यकता होती है।सल्फर केवल कृषि क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इसका इस्तेमाल रसायन उद्योग, पेट्रोलियम रिफाइनिंग और कई अन्य औद्योगिक गतिविधियों में भी बड़े स्तर पर किया जाता है। ऐसे में इसकी नियमित आपूर्ति कृषि के साथ साथ औद्योगिक क्षेत्र के लिए भी अहम मानी जाती है।
केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2025-26 के दौरान देश ने 41.92 लाख मीट्रिक टन सल्फर और उससे संबंधित उत्पादों का आयात किया। यह मात्रा पिछले वर्षों की तुलना में अधिक रही। सरकार के अनुसार बढ़ता आयात कृषि और उद्योग दोनों क्षेत्रों में बढ़ती मांग के अनुरूप आपूर्ति बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण है।भारत को सल्फर की आपूर्ति संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, कतर, सऊदी अरब, कुवैत, जापान, रूस, कनाडा और इराक समेत कई देशों से होती है।
पश्चिम एशिया में जारी परिस्थितियों का असर वैश्विक स्तर पर सल्फर की आपूर्ति पर पड़ने की आशंका के बीच केंद्र सरकार ने इसकी उपलब्धता पर नजर बनाए रखने की बात कही है। सरकार ने पेट्रोलियम मंत्रालय के साथ समन्वय कर रिफाइनरियों को उर्वरक क्षेत्र की जरूरतों के लिए सल्फर की आपूर्ति को प्राथमिकता देने की सलाह भी दी है।इसके अलावा पोषक तत्व आधारित रियायत योजना यानी एनबीएस के माध्यम से उर्वरक कंपनियों को सल्फर की व्यवस्था बनाए रखने में मदद मिल रही है।
इसी बीच छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा है कि यदि राज्य में यूसीसी लागू किया जाता है तो आदिवासी समाज के अधिकारों और हितों से किसी भी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।बैज ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए आदिवासी समाज पर यूसीसी लागू करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने सरकार से स्पष्ट करने की मांग की कि यूसीसी के दायरे से आदिवासी समाज को बाहर रखा जाएगा या नहीं।
दीपक बैज ने सरकार से यह भी पूछा कि यूसीसी लागू होने की स्थिति में प्रदेश में पेसा कानून की मौजूदा व्यवस्था बरकरार रहेगी या नहीं। उन्होंने पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाली पंचायतों के अधिकारों को लेकर भी सरकार से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की।बैज ने कहा कि पहाड़ी कोरवा, बिरहोर, अबुझमाड़िया, भुजिया और पांडा जैसी संरक्षित जनजातियों को संविधान के तहत विशेष संरक्षण प्राप्त है। ऐसे में किसी भी नए कानून को लागू करने से पहले उनके संवैधानिक अधिकारों और पारंपरिक व्यवस्थाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने बस्तर में आदिवासियों की जमीन के मुद्दे को भी उठाया। उनका आरोप है कि नक्सलवाद के खिलाफ अभियान में बदलाव और क्षेत्र में शांति की बात सामने आने के बाद भाजपा समर्थित उद्योगपतियों की नजर बस्तर की जमीन पर है।बैज ने आरोप लगाया कि आदिवासी हितों की कीमत पर उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि आदिवासियों की जमीन किसी दूसरे व्यक्ति या संस्था के कब्जे में न जाए, इसके लिए संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।कांग्रेस का कहना है कि बस्तर में विकास की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसमें स्थानीय आदिवासी समाज के अधिकार, जमीन और संवैधानिक संरक्षण सबसे ऊपर रहें।