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From the pen of senior journalist Dr. Shirish Chandra Mishra...52nd edition of 'Show Must Go On' - when will action be taken
प्रदेश में जिस तरह से कार्रवाईयां हो रही हैं उसमें पक्षपात ,भेदभाव और चेहरा देखकर काम करने की चर्चा है। सीबीआई ने रेरा के जिस चेयरमेन और मेडिकल कॉलेज के जिस डॉक्टर के खिलाफ एफआईआऱ की है उस पर राज्य सरकार ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है। कलेक्टर जो सीधे तौर पर भारतमाला के घोटाले में मुआवजा लेने और वापस करने के मामले में शामिल है उस पर ना तो कोई कार्रवाई की गयी है और ना ही एफआईआर। आबकारी के 28 अधिकारियों का निलम्बन तो हो गया लेकिन अग्रिम जमानत की याचिका खारिज होने के बाद भी गिरफ्तारी नहीं हुई है। महादेव एप के मामले में जेल में बंद एएसआई को अब तक बर्खास्त नहीं किया गया है। सीजीएमएससी की खरीदी में गड़बड़ी के संदिग्ध चारों आईएएस अधिकारी मजे से नौकरी कर रहे हैं। कोल लेवी मामले के आरोपी दो आईएएस और राज्य सेवा की एक अधिकारी के खिलाफ भी बर्खास्तगी जैसे कदम नहीं उठाए जा सके हैं। ऐसा लगता है कि सरकार की कार्रवाई की इच्छाशक्ति आईएएस और आईपीएस तक आते-आते हांफने लगती है।
विधानसभा के मानसून सत्र की कार्यवाही देखें तो साफ दिखता है कि राजस्व मंत्री ने आरआई प्रमोशन की परीक्षा के आरोपियों को बचाने के लिए किस तरह का गोल-मोल जबाव दिया। भाजपा के ही वरिष्ठ विधायकों और पूर्व मुख्यमंत्री के सवालों के कैसे जबाव दिए गए हैं। जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट दे दी। उस रिपोर्ट पर कार्रवाई के बजाय अब मामले को ईओडब्ल्यू को दे दिया। ताकि मामला ठंडे बस्ते में चला जाए। ईओडब्ल्यू वैसे भी इतनी सारी जांचें कर रही है कि इस मामले की जांच कब शुरू होगी कहा नहीं जा सकता है । फिर भी जब इस मामले की जांच रिपोर्ट आ गयी है तो सीधे एफआईआर करवाकर कार्रवाई क्यों नहीं की गयी। मीडिया में लगातार गड़बड़ी की खबरें प्रसारित होने और विधानसभा में चर्चा होने के बाद भी आरोपियों को बचाना समझ से परे है।
शराब घोटाले मामले में आबकारी अधिकारियों के बाद अब डिस्लरीज के मालिकों और एफ एल -10 (फॉरेन लिकर) के कारोबारियों का नम्बर आने वाला है। ईओडब्ल्यू ने इनके खिलाफ चालान पेश करने के लिए तैयारियां तेज कर दी हैं। उम्मीद है कि अगले महीने तक इन सबका नम्बर आ जायेगा। इसके साथ ही आबकारी के बचे कुछ बड़े अधिकारियों पर भी कार्रवाई की संभावना लग रही है। जब आबकारी अधिकारियों के खिलाफ चालान पेश किया था तब अधिकारियों की गिरफ्तारी के साथ ही दो बड़े अधिकारियों और डिस्लरीज के मालिकों के खिलाफ कार्रवाई ना होने का मुद्दा उठा था। ऐसे में शराब घोटाले के एक औऱ पूरक चालान में ये सभी शामिल हो सकते हैं। वैसे शराब घोटाले के 70 आरोपियों में से 13 को गिरफ्तार किया जा चुका है जिसमें से कई आरोपी जेल में हैं और कुछ की जमानत भी हो गयी है।
पूर्व मुख्यमंत्री के घर 6 माह में तीसरी बार और विधानसभा सत्र के दौरान दूसरी बार उनके पुत्र के जन्मदिन के दिन सुबह-सुबह ईडी ने छापा मारा। करीब 7 घंटे तक पूछताछ के बाद उनके पुत्र को विशेष कोर्ट में पेश कर दिया गया था । मनी ट्रेल औऱ प्रोसीड ऑफ क्राइम का ब्यौरा देकर उनकी 5 दिनों की रिमांड ले ली। इस घटनाक्रम पर आश्चर्यजनक तरीके से लोकसभा में विपक्ष के नेता का कोई बयान नहीं आया जबकि उन्होंने अपने जीजा के खिलाफ ईडी की कार्रवाई पर प्रतिक्रिया जरुर दी। हालांकि उनकी बहन ने पूर्व मुख्यमंत्री के समर्थन औऱ ईडी के खिलाफ बयान दिया है। ना ही कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष की ओर से कोई प्रतिक्रिया आयी है। ईडी की कार्रवाई पर विरोध और आरोप का जो पॉलिटिकल दस्तूर है वो भी नहीं हुआ। इन बातों के क्या मायने हो सकते हैं ये कांग्रेस के जानकार लोग ही बता सकते हैं। हालांकि पार्टी के अंदर एक बड़ा वर्ग है जो पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई को लेकर उनके साथ मजबूती से खड़ा नहीं दिखाई दे रहा है।
पिछली सरकार के कोषाध्यक्ष को ईडी से भागते तीन साल से ज्यादा का समय हो गया है। उनके विदेश में होने की जानकारी है। लेकिन कोषाध्यक्ष के पास इकट्ठे होने वाले पैसों का हिसाब जो व्यक्ति रखता था उसे गिरफ्तार कर लिया गया है। ये राजदार भी तीन साल से ज्यादा समय से फरार था। एजेन्सियों ने अब तक ये नहीं बताया है कि उसे कहां से और कब गिरफ्तार किया गया है। बताते हैं कि राजदार के पास एक डायरी थी जिसमें तीन मदों शराब,कस्टम मिलिंग और कोल लेवी का हिसाब-किताब है। यानी कितना पैसा कहां-कहां से आया और कहां-कहां पहुंचाया गया। पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे की गिरफ्तारी में ईडी ने अपने रिमांड आवेदन में अभी तक तो इस राजदार के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है। लेकिन यदि घटनाक्रमों पर नजर दौड़ाई जाये तो पहले तांत्रिक की गिरफ्तारी ,फिर तांत्रिक के करीबी की गिरफ्तारी ,फिर होटल व्यवसायी के यहां छापा और इस बीच राजदार की गिरफ्तारी । एजेन्सी पहले भी कांग्रेस की राज्य सरकार के कार्यकाल में पूर्व मुख्यमंत्री के पुत्र को कई बार पूछताछ के लिए बुला चुकी थी। लेकिन गिरफ्तार नहीं किया था लेकिन हाल की दो-तीन गिरफ्तारियों और पूर्व सीएम के तीन करीबियों से पूछताछ के बाद उनके बेटे की गिरफ्तारी को इन घटनाक्रमों से जोड़कर देखा जा रहा है।
केन्द्र औऱ राज्य की एजेन्सियां एक ही मामलों के अलग-अलग पहलुओं पर जांच कर रही हैं। जैसे कोल-लेवी और कस्टम मिलिंग की जांच राज्य की एजेन्सी एफआईआर करके एक्सटोर्शन के एंगल से जांच कर रही है तो केन्द्र की एजेन्सी उस पैसे को ठिकाने लगाने के लिए मनी लॉन्ड्रिंग के एंगल से जांच कर रही है। इस तरह से कोषाध्यक्ष औऱ उनका राजदार एक्सटोर्शन औऱ मनी लॉन्ड्रिंग दोनों मामलों में आरोपी हैं। लेकिन नामी होटल व्यवसायी और ज्वेलर्स मनी लॉन्ड्रिंग के मामले की चपेट में हैं। इस तरह से कई अधिकारी और नेता दोनों मामलों में दोनों एजेन्सियों के राडार पर हैं तो कुछ सिर्फ एक ही एजेन्सी की जद में हैं। जब कांग्रेस की सरकार थी तो केन्द्र की एजेन्सी सिर्फ मनी लॉन्ड्रिंग की जांच कर रही थी हालांकि बंगलूरु की एफआईआऱ के आधार पर कोल लेवी के सरगना पर एक्सटोर्शन और मनी लॉन्ड्रिंग दोनों मामले में आरोपी बनाकर अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया गया था। बाद में कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार आने के बाद एक्सटोर्शन की धाराएं हटाकर छत्तीसगढ़ को कार्रवाई करने कहा गया था लेकिन यहां भी कांग्रेस की सरकार होने के केस दर्ज नहीं हुआ । वर्ष 2023 में भाजपा की सरकार के आने के बाद राज्य की एजेन्सी ने कोल लेवी और कस्टम मिलिंग मामले में एक्सटोर्शन की धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरु की । जबकि शराब घोटाले में एक्सटोर्शन जैसा कोई मामला नहीं बनता था क्योंकि उस घोटाले में सभी का फायदा हो रहा था।
राजधानी से करीब 40 किलोमीटर दूर एक मशरुम के फार्म में पड़ोसी राज्य के बच्चों और मजदूरों को बंधक बनाने का मामला सामने आया है। लेकिन फार्म के मालिक के खिलाफ कार्रवाई में पुलिस के हाथ कांप रहे हैं। मामले को रफा-दफा करने की भरपूर कोशिश की गयी है। किसी झंझट से बचने के लिए ठेकेदारों के खिलाफ मामला दर्ज कर पुलिसिया कार्रवाई की इतिश्री करने का प्रयास किया गया है। जिसका फार्म है उसके तगड़े कनेक्शन ऐसे अधिकारियों और नेताओं से बताए जाते हैं जो काफी प्रभावशाली हैं । कुछ साल पहले भी फार्म मालिक की एक फैक्ट्री में मजदूरों को बंधक बनाने का मामला चर्चा में रहा था । इस मामले में जब पुलिस से पूछा गया तो बताया गया कि श्रम विभाग की रिपोर्ट नहीं मिली है। क्या पुलिस सभी मामलों में ऐसा करती है ये बड़ा सवाल है।
राजधानी पुलिस कानून के हिसाब से कितना काम करती है और अपने हिसाब से कितना, ये तो पुलिस के अधिकारी ही बता सकते हैं। राजधानी के एक इलाके में मारपीट औऱ हिंसा के मामले में पुलिस ने कार्रवाई करके चार-पांच आरोपियों को जेल भेज दिया। आधी-अधूरी कार्रवाई में कुछ आरोपियों के नाम बताए गए तो कुछ के छिपा लिये गए। रसूखदार आरोपी जिसके पास गुंडों की बड़ी फौज है जिसमें शहर की अपराधिक दुनिया के नामी हिस्ट्रीशीटर हैं। रसूखदार आरोपी ने इन सबको रहने के लिए ना सिर्फ घर दिया हुआ है बल्कि बहुत मंहगी कारें भी। जुआ खेलने के शौकीन रसूखदार के पिता किसी उद्योग संगठन के पदाधिकारी भी हैं। रसूखदार अपने साथ कारों का काफिला लेकर चलता है और उस काफिले में गुंडों की फौज होती है। ऐसे लोगों पर कार्रवाई करने में भी पुलिस क्यों कतराती है और मीडिया को जानकारी देने से बचने का प्रयास करती है। ये समझ से परे है। होना तो ये चाहिए था कि पुलिस रसूखदार को रिमांड पर लेकर पूछताछ करती तो पता चलता कि इन लोगों ने शहर के कितने लोगों के साथ मारपीट और हिंसा की है। पुलिस की ढिलाई ही तोमर जैसों को डॉन बनाने का काम करती है।
पिछली सरकार के स्पेशल 36 ग्रुप के मिडिल रैंक के पुलिस अधिकारी अपने पॉवर, पैसे और सम्पर्कों के जरिए वर्तमान सरकार की मंशा को तार-तार कर रहे हैं। ऐसे अधिकारियों पर वरिष्ठ अधिकारियों का वरदहस्त बताया जाता है। एक विवादास्पद अधिकारी के करीबी को बस्तर के दूरस्थ अंचल में पोस्टिंग दी गयी थी। लेकिन सबके खेवनहार इस अधिकारी ने उन्हें बस्तर संभाग के मुख्यालय की साइबर सेल में तैनात करवा दिया वो भी बिना किसी आर्डर के। इसी तरह एक डिमोट हुए इंस्पेक्टर ने अपने खिलाफ आईजी द्वारा की गयी कार्रवाई को खत्म कराने के लिए राजधानी के कई रिटायर्ड वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को काम पर लगा दिया है। शीर्ष पदों से रिटायर्ड ये बेचारे पुलिस अधिकारी कभी उस इंस्पेक्टर से उपकृत हुए होंगें तभी तो आईजी की कार्रवाई निरस्त करवाने के लिए आईजी से ऊपर के अधिकारियों के पास तगड़ी लॉबिंग कर रहे हैं। आप समझ सकते हैं कि किस तरह का नेक्सस पुलिस में चल रहा है सब इंस्पेक्टर से लेकर ऊपर तक। नेक्सस तो इतना तगड़ा है कि किसी आर्डर में किसी का नाम चुपके से जुड़वा दिया जाता है तो कहीं किसी का नाम कटवा दिया जाता है।
एक साल से ज्यादा का समय हो गया है। मंत्री बनने के लिए टकटकी लगाए विधायकों की आस अब धूमिल होने लगी है। मीडिया में चर्चाओं पर विराम लग गया है। हालांकि विधानसभा सत्र के समापन के बाद उम्मीद की बहुत धुंधली किरण दिखाई जरुर दे रही है । लेकिन इतनी सशक्त नहीं कि दावे से कहा जा सके कि फलां तारीख या महीने में मंत्रिमंडल का विस्तार हो ही जायेगा। सरकार की तैयारियां छत्तीसगढ़ के रजत जयंती वर्ष मनाने की दिशा में तेज हो गयी हैं। इस बार का राज्योत्सव विशेष होगा और उसके बाद फिर विधानसभा के शीतकालीन सत्र की बारी आ जायेगी। सरकार का फोकस इन दोनों पर ज्यादा होगा, ऐसे में सरकार और संगठन में कोई ये बताने की स्थिति में नहीं है कि मंत्रिमंडल का विस्तार होगा भी कि नहीं। यदि होगा तो कब।
जैसी की घोषणा हो चुकी है कि अगला विधानसभा सत्र नवा रायपुर के नये भवन में होगा। लेकिन काम को देखते हुए शीतकालीन सत्र तो नहीं लेकिन बजट सत्र की संभावना जरुर बन सकती है। रजत जयंती वर्ष में विधानसभा के नये भवन का औपचारिक उद्घाटन हो सकता है। फिर बाकी बचे कामों को पूरा करके बजट सत्र भले ही नये भवन में हो, इसकी संभावना ज्यादा है। वैसे भी बजट सत्र के पहले दिन राज्यपाल का अभिभाषण होता है। ऐसे में ज्यादा संभावना बजट सत्र की ही दिखाई दे रही है। वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष ऐसे सौभाग्यशाली व्यक्ति होंगें जो नये मंत्रालय में मुख्यमंत्री के रुप में सबसे पहले काम शुरु किए। इसी तरह नये विधानसभा भवन के शुभारंभ के समय भी वो अध्यक्ष के रुप में काम करने वाले पहले व्यक्ति होंगें।