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Has the AI bubble burst? – Dr. Yogendra Srivastava, Jabalpur
पिछले हफ्ते दुनिया की सबसे बड़ी टेक्नोलॉजी सेवा प्रदाता कम्पनी गूगल और अमेजन के तिमाही नतीजों से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई जगत में घबराहट फैल गयी है। इनके साथ ही एआई से जुड़ी अन्य कंपनियां जैसे एंथ्रोपिक, कैटरपिलर, सर्विस नाउ आदि के तिमाही नतीजे भी एआई पर बढ़ते खर्च से प्रभावित हुये हैं। अमेरिकी शेयर बाजार ने भी इस संकेत की पुष्टि की और गूगल की पेरेंट कम्पनी एल्फ़ाबेट के शेयरों में एक हो दिन में 13 प्रतिशत की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गयी।
यद्यपि अभी भी विशेषज्ञों के बीच पूरी सहमति नहीं है लेकिन अधिकांश का कहना है कि एआई का बुलबुला फूट रहा है। और इसका सबसे बड़ा कारण है एआई पर बेतहाशा खर्च। ज्ञात हो कि भले ही सारी दुनिया में इंसानों की जगह एआई की उपयोगिता का गुणगान हो रहा हो, इसको तैयार करने का खर्च इतना अधिक है कि लागत का बमुश्किल 10 से 15 प्रतिशत ही वसूल हो पाता है। इसी के चलते टेक्नोलॉजी कंपनियों के मुनाफे में कमी आ रही है और कुछ कंपनियां तो घाटे में भी आ गई हैं। एआई पर निर्भरता बढ़ाने की विश्वव्यापी कोशिशों के बीच यह एक गम्भीर चेतावनी है।
देखने में यह एकदम हैरान करने वाली बात है कि टेक्नोलॉजी से जुड़ी कंपनियां हर काम में टेक्नोलॉजी का उपयोग बढ़ाने की कोशिश में घाटा क्यों उठा रही हैं। यह एक रोचक विरोधाभास है। वास्तव में एआई का उपयोग करने के लिये एल्गोरिदम और कोडिंग की बेहद जटिल प्रक्रिया की जरूरत होती है। इसके लिये बहुत से विशेषज्ञ कंप्यूटर इंजीनियर्स की जरूरत होती है। यानी जिस एआई को मानवीय परिश्रम कम करने का औजार बनाया जा रहा है, उसे तैयार करने में काफी अधिक मानवीय परिश्रम की जरूरत होती है। फिर एआई के लिये सबसे जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर है डेटा सेन्टर जिसकी निर्माण लागत और संचालन बेहद खर्चीला है। बड़े बड़े सर्वर संयंत्रों को लगातार ठंडा रखने में पानी की अत्यधिक मात्रा की जरूरत होती है। बहुत से शहरों में डेटा सेन्टर के निर्माण की खबर से कई सामाजिक संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया है क्योंकि इस बात की पूरी आशंका है कि डेटा सेन्टर बनने से उस शहर में पानी की कमी हो जायेगी। यानी बहुत से मानवीय भागीदारी के कामों को एआई से करवाने के लिये अत्यधिक मानवीय और प्राकृतिक संसाधनों की आवश्यकता है। साथ ही इसका असर रोजगार पर भी पड़ने वाला है। अभी हाल में माइक्रोसॉफ्ट ने अपने साठ हजार कर्मचारियों को आकर्षक पैकेज के साथ नौकरी छोड़ने का ऑफर दिया है। हो सकता है भावी घाटे को कम करने के इरादे से दूसरी कंपनियां भी ऐसे कदम उठाएं। यानी एआई के अलावा अन्य कामों से जुड़े इंजीनियर्स को कमतर समझकर नौकरी से निकाला भी जा सकता है। बहरहाल ऐसे कई विरोधाभासों के साथ भारी भरकम लागत ने अब एआई के औचित्य पर सवाल खड़े कर दिये हैं।
इतिहास गवाह है कि हर टेक्नोलॉजी अपने साथ विभिन्न प्रकार की समस्याएं लेकर आई है। यूरोप में 18वीं और 19वीं सदी की औद्योगिक क्रान्ति के बाद वहां बेरोजगारी और असमानता का दौर चला और सारी दुनिया पर पर्यावरण संकट के लिये सबसे ज्यादा जिम्मेदार यूरोप के औद्योगीकरण को ही माना जाता है। ऊर्जा उत्पादन के उद्देश्य से विकसित परमाणु ऊर्जा की विभीषिका दुनिया दूसरे विश्वयुद्ध में देख ही चुकी है। कंप्यूटर युग में अति आधुनिक मशीनों के विकास के साथ बहुत से कामों में मानवीय भागीदारी कम होने से से अकुशल श्रमिकों के लिये संकट पैदा हुआ है। इसी तरह एआई का विकास भी दोधारी तलवार के समान है।
बहरहाल एआई को लेकर इस कशमकश के बीच दुनिया की सारी टेक्नोलॉजी कम्पनियों में चिन्ता की लहर दौड़ गयी है। यद्यपि एआई का भविष्य अनिश्चित है लेकिन प्रतिस्पर्धा के चलते कोई भी कम्पनियां इसको नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहतीं, साथ ही इसकी भारी लागत को लेकर भी आशंकित हैं। दरअसल "इधर कुआँ उधर खाई" वाली स्थिति है। बहरहाल एआई को लेकर दुनिया भर के टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ एकराय नहीं हैं और यह तो वक्त ही बतायेगा कि एआई दुनिया के लिये फायदेमंद रहेगा या नुकसानदेह साबित होगा।