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High Court gets tough on RTE: Seeks full details regarding reserved seats, admissions, and vacant seats in private schools.
बिलासपुर। शिक्षा के अधिकार (RTE) कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान राज्य के शिक्षा विभाग की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। बिना मान्यता संचालित स्कूलों के मुद्दे पर चल रही सुनवाई के बीच हाईकोर्ट ने अब निजी स्कूलों में RTE के तहत आरक्षित सीटों, प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों और खाली सीटों की स्थिति का विस्तृत ब्योरा मांगा है।
न्यायालय ने राज्य सरकार को इस संबंध में विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। सरकार को यह जानकारी तीन सप्ताह के भीतर कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में भगवंत राव बनाम Union of India & Others मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश कृष्णा राम महापात्रा एवं न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ में हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य सरकार से RTE के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए अपनाई जा रही SOP (Standard Operating Procedure) की भी जानकारी मांगी है।
न्यायालय के निर्देश के अनुसार राज्य सरकार को हलफनामे में RTE के क्रियान्वयन से जुड़ी वास्तविक और स्कूलवार जानकारी उपलब्ध करानी होगी।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि राज्य सरकार यह स्पष्ट करे कि छत्तीसगढ़ में RTE अधिनियम के तहत प्रत्येक निजी स्कूल में कितनी सीटें आरक्षित हैं और इनमें से कितनी सीटों पर विद्यार्थियों को प्रवेश दिया गया है।
इसके साथ ही प्रत्येक स्कूल में वर्तमान में कितनी RTE सीटें खाली हैं, इसकी जानकारी भी देनी होगी। सरकार को हलफनामे के साथ एक विस्तृत चार्ट भी प्रस्तुत करना होगा, जिसमें प्रदेश के प्रत्येक संबंधित स्कूल के लिए RTE के तहत आरक्षित सीटों की संख्या, प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या, रिक्त सीटों की संख्या का स्पष्ट विवरण होगा।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के सक्षम अधिकारी को तीन सप्ताह के भीतर हलफनामा और आवश्यक चार्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।
मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 को निर्धारित है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि हलफनामा अगली सुनवाई से कम से कम सात दिन पहले दाखिल किया जाए और उसकी प्रति संबंधित पक्षों के अधिवक्ताओं को उपलब्ध कराई जाए।
इस मामले में विकास तिवारी इंटरवीनर (हस्तक्षेपकर्ता) के रूप में न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुए। उनके अनुसार हाईकोर्ट का यह आदेश RTE Act की धारा 12(1)(c) के वास्तविक और प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में महत्वपूर्ण है।
उनका कहना है कि स्कूलवार आरक्षित सीटों, प्रवेशित विद्यार्थियों और रिक्त सीटों का वास्तविक आंकड़ा सामने आने से यह पता चल सकेगा कि प्रदेश में RTE के तहत पात्र बच्चों को उनके अधिकार का लाभ किस स्तर तक मिल रहा है।
उन्होंने कहा कि RTE केवल कागजों पर लागू रहने वाला कानून नहीं है, बल्कि पात्र बच्चों को शिक्षा का अधिकार दिलाना संवैधानिक जिम्मेदारी है। यदि आरक्षित सीटें खाली रह रही हैं तो इसके कारण और उनके समाधान की व्यवस्था भी पारदर्शी होनी चाहिए।
बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 को संसद ने 4 अगस्त 2009 को पारित किया था और यह कानून 1 अप्रैल 2010 से प्रभावी हुआ।
छत्तीसगढ़ में RTE Act की धारा 12(1)(c) के तहत लाभ सत्र 2010-11 से दिया जा रहा है। शुरुआत में इसका लाभ कक्षा आठवीं तक दिया जाता था। बाद में राज्य स्तर पर इसमें संशोधन करते हुए सत्र 2019 में इसे कक्षा 12वीं तक बढ़ाया गया। इसके साथ ही पात्र बच्चों को नर्सरी स्तर से निजी स्कूलों में RTE के तहत प्रवेश दिए जाने की व्यवस्था भी लागू रही।
छत्तीसगढ़ में RTE के तहत आरक्षित सीटों के आंकड़े में पिछले कुछ वर्षों में लगातार गिरावट देखने को मिली है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2018-19 में करीब 80 हजार सीटें RTE के लिए आरक्षित थीं। वर्ष 2022-23 तक यह संख्या घटकर करीब 52 हजार रह गई।
अब 2026-27 में RTE के तहत आरक्षित सीटों की संख्या घटकर महज 23,078 रह गई है। यानी शुरुआती वर्षों की तुलना में आरक्षित सीटों की संख्या में बड़ी कमी आई है।
वर्तमान शैक्षणिक सत्र 2026-27 में RTE के तहत उपलब्ध 23,078 सीटों के लिए कुल 41,813 आवेदन प्राप्त हुए हैं। वहीं शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार KG-1 से लेकर कक्षा 12वीं तक RTE के तहत प्रदेश में कुल 3,65,811 बच्चे अध्ययनरत हैं। इन आंकड़ों के बीच आरक्षित सीटों में लगातार हो रही कमी ने RTE के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
RTE के तहत सीटों में लगातार कमी को लेकर जहां कुछ जानकार निजी स्कूल संचालकों और शिक्षा विभाग के अधिकारियों के बीच मिलीभगत के आरोप लगाते रहे हैं, वहीं विभाग के अधिकारियों की अपनी अलग दलील है।
अधिकारियों का कहना है कि RTE के नियमों में बच्चों के घर से स्कूल की दूरी से संबंधित प्रावधान लागू होते हैं। इसके अलावा कई अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला बड़े और चुनिंदा निजी स्कूलों में कराना चाहते हैं। इन कारणों से सभी पात्र बच्चों को RTE का लाभ नहीं मिल पाता।
RTE के तहत सीटों में कमी के पीछे एक बड़ा कारण नर्सरी स्तर पर प्रवेश से जुड़ा बदलाव भी माना जा रहा है।
हाईकोर्ट में RTE को लेकर सुनवाई के बीच शिक्षा विभाग ने पिछले वर्ष नर्सरी की जगह कक्षा पहली से RTE के तहत प्रवेश की व्यवस्था लागू कर दी। हालांकि इस संबंध में अब तक कोई औपचारिक नोटिफिकेशन जारी नहीं होने और विधानसभा या कैबिनेट में प्रस्ताव पारित नहीं होने का मुद्दा भी सामने आया है।
प्रदेश के अधिकांश निजी स्कूलों में पढ़ाई नर्सरी से शुरू होती है। ऐसे में नर्सरी स्तर पर RTE प्रवेश बंद होने का सीधा असर आरक्षित सीटों की संख्या पर पड़ा है। साथ ही, अभिभावकों द्वारा शुरुआती कक्षाओं से ही बच्चों का दाखिला कराने की इच्छा के चलते RTE के लिए आवेदन की संख्या भी प्रभावित हुई है।
RTE के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई अब महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गई है। कोर्ट के निर्देश के बाद राज्य सरकार को पहली बार स्कूलवार आरक्षित, भरी और खाली सीटों का विस्तृत आंकड़ा प्रस्तुत करना होगा।