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High Court's strong message: Not just the medical report, but the victim's true testimony can also secure punishment
बिलासपुर। हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ कर दिया है कि दुष्कर्म जैसे गंभीर मामलों में केवल मेडिकल या डीएनए रिपोर्ट ही अंतिम आधार नहीं होती। यदि पीड़िता की गवाही स्पष्ट, सुसंगत और विश्वसनीय है, तो उसी के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है। कोर्ट ने सात साल की मासूम बच्ची से जुड़े मामले में आरोपी की अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
घटना की पृष्ठभूमि: मासूम के साथ विश्वासघात
यह मामला बेमेतरा जिले का है, जहां एक छोटी बच्ची अपने माता पिता के काम पर जाने के दौरान गांव में रिश्तेदार के साथ रहती थी। एक दिन वह पड़ोसी के घर गई और काफी देर तक वापस नहीं लौटी। जब उसकी बहन उसे लेने पहुंची, तो बच्ची संदिग्ध हालत में मिली। घर आने के बाद बच्ची ने जो बताया, उसने सभी को झकझोर दिया। उसने पड़ोसी पर दुष्कर्म का आरोप लगाया।इस गंभीर मामले की शिकायत 17 मई 2022 को दर्ज कराई गई, जिसके बाद पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया।
मेडिकल और डीएनए रिपोर्ट नहीं बनी ढाल, फिर भी सजा कायम
जांच के दौरान मेडिकल रिपोर्ट में स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले और डीएनए रिपोर्ट भी आरोपी के पक्ष में रही। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता और अन्य गवाहों के बयानों को भरोसेमंद मानते हुए आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।आरोपी ने हाई कोर्ट में अपील करते हुए खुद को निर्दोष बताया। उसने कहा कि उसे झूठा फंसाया गया है, गवाहों के बयान विरोधाभासी हैं और वह गूंगा बहरा तथा अशिक्षित होने के कारण पूरी प्रक्रिया को समझ नहीं पाया। लेकिन कोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया।
कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी: वैज्ञानिक रिपोर्ट राय है, गवाही सच्चाई
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि मेडिकल या वैज्ञानिक रिपोर्ट केवल एक राय होती है, जबकि प्रत्यक्ष गवाही यदि मजबूत और भरोसेमंद हो, तो उसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कोर्ट ने माना कि बच्ची की गवाही पूरी तरह विश्वसनीय है और उसी के आधार पर दोष सिद्ध होता है।
महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों पर कोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान अदालत ने समाज में महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ बढ़ते अपराधों पर भी चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को संवेदनशील और सख्त होना जरूरी है, ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके।अंत में हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए आरोपी की अपील खारिज कर दी और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा।