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Homemakers receive highest recognition; Supreme Court declares women 'nation-builders' and sets their monthly value at ₹30,000.
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम और ऐतिहासिक फैसले में गृहिणियों के योगदान को नई कानूनी पहचान दी है। अदालत ने कहा है कि घर संभालने वाली महिलाएं केवल ‘होममेकर’ नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाली ‘राष्ट्र निर्माता’ हैं।सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटना से जुड़े एक मामले में गृहिणी के घरेलू श्रम का मूल्य कम से कम 30 हजार रुपये प्रति माह तय करने का निर्देश दिया है। साथ ही कहा गया है कि यह राशि हर तीन साल में 10 प्रतिशत बढ़ाई जाएगी।
मुआवजे की नई व्यवस्था, घरेलू देखभाल को अलग से जोड़ा जाएगा
अदालत ने स्पष्ट किया कि भविष्य में सड़क दुर्घटना में गृहिणी की मृत्यु के मामलों में ‘लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर’ को एक अलग मद के रूप में शामिल किया जाएगा। इससे मुआवजा तय करने की प्रक्रिया अधिक न्यायसंगत होगी।अब तक ऐसे मामलों में गृहिणियों को न्यूनतम मजदूरी या अकुशल श्रमिक के आधार पर आंका जाता था, जिसे कोर्ट ने उनके योगदान का गंभीर अवमूल्यन बताया।
शादी नौकरानी रखने का अनुबंध नहीं, कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि विवाह का अर्थ किसी को घरेलू कार्यों के लिए नौकरानी के रूप में देखना नहीं है। अदालत ने कहा कि घर के भीतर किया जाने वाला श्रम भी उतना ही मूल्यवान है जितना बाहर का वेतनभोगी कार्य।अर्थशास्त्री सर सेसिल पिगू का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जब तक वही सेवा वेतन के बदले दी जाती है, तब तक राष्ट्रीय आय में गिनी जाती है, लेकिन घर में मुफ्त किए जाने पर उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है।
62.77 लाख रुपये मुआवजे का आदेश, 25 साल पुराने मामले में फैसला
यह फैसला हरियाणा से जुड़े 2001 के एक सड़क हादसे के मामले में आया है। एक गृहिणी की मृत्यु के बाद उनके परिवार ने मुआवजे की मांग की थी। ट्रिब्यूनल ने शुरुआत में 2.42 लाख रुपये मुआवजा दिया था, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने बढ़ाकर 8.43 लाख रुपये किया।सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए गृहिणी की मासिक आय 30 हजार रुपये मानते हुए कुल मुआवजा बढ़ाकर 62.77 लाख रुपये कर दिया।
महिलाओं के अवैतनिक श्रम को मिली आर्थिक मान्यता
कोर्ट ने यह भी माना कि 15 से 59 वर्ष की महिलाएं प्रतिदिन औसतन 7 घंटे से अधिक अवैतनिक घरेलू कार्य करती हैं, जिसका देश की जीडीपी में लगभग 15 से 17 प्रतिशत तक योगदान है।
पुरुषों को भी मिली मान्यता, लेकिन फिलहाल महिलाओं पर फोकस
अदालत ने कहा कि पुरुष भी गृहकार्य संभाल सकते हैं और उन्हें भी ‘होममेकर’ माना जाना चाहिए, लेकिन फिलहाल 30 हजार रुपये मासिक मूल्य का मानक महिलाओं के मामलों पर लागू किया गया है।
लंबे समय से लंबित मामलों पर चिंता, तेजी से निपटारे के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने मोटर वाहन दुर्घटना मुआवजा मामलों में वर्षों तक चलने वाली देरी पर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि कई मामलों में न्याय मिलने में 15 से 18 साल तक लग जाते हैं, जो न्याय की अवधारणा को कमजोर करता है।
फैसले का असर, भविष्य के मामलों के लिए बनेगा नजीर
यह निर्णय अब देशभर में ऐसे सभी मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है, जिसमें गृहिणियों के योगदान और घरेलू श्रम का आर्थिक मूल्य तय किया जाएगा।