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Insurance companies cannot impose arbitrary conditions; major relief for consumers.
नई दिल्ली। बीमा दावों को लेकर उपभोक्ताओं के अधिकारों को मजबूत करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बीमा कंपनियां अपने नियमों का मनमाने तरीके से इस्तेमाल कर क्लेम खारिज नहीं कर सकतीं। अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में बीमा कंपनी पर 2.36 लाख रुपये का जुर्माना लगाया और उपभोक्ता के पक्ष में फैसला सुनाया।
मामला एक महिला से जुड़ा है, जिसे सड़क दुर्घटना के बाद गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह करीब 28 दिन तक वेंटिलेटर सहित जीवनरक्षक उपकरणों के सहारे उपचाराधीन रही। बाद में उसकी मौत हो गई। इसके बाद परिजनों ने बीमा कंपनी से क्लेम मांगा, लेकिन कंपनी ने पॉलिसी की शर्तों का हवाला देकर दावा अस्वीकार कर दिया।
बीमा कंपनी का कहना था कि पॉलिसी की कुछ शर्तों के अनुसार यह मामला क्लेम के दायरे में नहीं आता। इसी आधार पर उसने भुगतान से इनकार कर दिया। इसके बाद मामला उपभोक्ता आयोग और फिर अदालत तक पहुंचा।
राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने पहले उपभोक्ता के पक्ष में फैसला सुनाया। आयोग ने माना कि कंपनी ने अनुचित तरीके से क्लेम रोका है। इसके बाद बीमा कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि बीमा अनुबंध का उद्देश्य जरूरत के समय उपभोक्ता को आर्थिक सुरक्षा देना है। यदि कंपनियां तकनीकी आधार पर वास्तविक दावों को खारिज करेंगी तो इससे बीमा व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर होगा। अदालत ने माना कि कंपनी ने सेवा में कमी बरती और उपभोक्ता के साथ अनुचित व्यवहार किया।
अदालत ने बीमा कंपनी की अपील खारिज करते हुए उस पर 2.36 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। साथ ही उपभोक्ता को बीमा राशि और अन्य देय लाभ निर्धारित नियमों के अनुसार उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया।
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में बीमा कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण नजीर साबित होगा। अब कंपनियों को केवल तकनीकी आधार पर वास्तविक दावों को अस्वीकार करने से पहले अधिक सावधानी बरतनी होगी। वहीं उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए यह निर्णय एक मजबूत संदेश माना जा रहा है।