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Is it time to establish the responsibility and accountability of the government? – Dr. Yogendra Srivastava
जबलपुर। फिलहाल सिर्फ भारत में नहीं सारी दुनिया में सरकारों के खिलाफ आम आदमी का असंतोष सड़कों पर दिखाई दे रहा है। सबसे ज्यादा उथल पुथल दक्षिण पश्चिमी यूरोप में हो रही है जहां फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, बेल्जियम, इटली, अल्बानिया आदि में अलग अलग मुद्दों पर प्रदर्शन चल रहे हैं। अगर फ्रांस और इटली में स्कूलों की बदहाली से नाराजगी है तो स्पेन और पुर्तगाल के नागरिक बढ़ते मकान किराये और महँगाई से त्रस्त हैं। अल्बानिया में भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आक्रोश उमड़ रहा है और बेल्जियम में नागरिक सुविधाओं में बजट कटौती का विरोध हो रहा है। इंग्लैण्ड में पहले से ही अवैध आप्रवासियों का मुद्दा सरकार के गले की फांस बना हुआ है। उधर अमेरिका की मुश्किलें भी मध्यावधि चुनाव के दौरान उभर कर सामने आई हैं और आम लोग राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के युद्ध प्रेम और टैरिफ मनमानी से पैदा हुई महंगाई से परेशान हैं।
वास्तव में बहुत लम्बे समय से जारी रूस-यूक्रेन, इजरायल-फिलिस्तीन और अमेरिका-ईरान के बीच जारी अंतहीन प्रतीत होने वाले संघर्षों ने सारे विश्व की अर्थव्यवस्था को तहस नहस कर दिया है और अब तो विकसित देश भी इस इस आँच में झुलस रहे हैं। इतिहास गवाह है कि संकट की घड़ी में सरकारों की असल परीक्षा होती है और यह दौर लगभग पूरी दुनिया की परीक्षा ले रहा है। इन सब असंतोष और प्रदर्शनों के बीच जो एक कॉमन फैक्टर है, वह है सरकार की जिम्मेदारी और जवाबदेही की माँग। जिन देशों में यह शिक्षा और नागरिक सुविधाओं में कटौती हुई है जिसका प्रभाव जनता पर ही पड़ा है। इसीलिए लोग अपने टैक्स के पैसों का सही उपयोग देखना चाहते हैं जिससे आम नागरिकों का जीवन बेहतर हो सके।
भारत में सरकारों से सीधे ऐसी माँग नहीं कि जाती क्योंकि अभी शिक्षा और जागरूकता का स्तर विकसित देशों जितना नहीं है। लेकिन अभाव, असंतोष और असमानता का ये कठिन समय धीरे धीरे जनमानस को आन्दोलित कर रहा है और सवाल पूछने का दौर शुरू हो गया है। यह हम देख ही रहे हैं कि सोशल मीडिया की गहरी पहुँच मुद्दों को बहुत जल्द सर्वव्यापी बना देती है इसलिए हमारी सरकारों को भी इस चुनौती का सामना जल्द ही करना पड़ेगा।
देश में विकास का प्रचार जारी है लेकिन जीडीपी, विदेशी मुद्रा भंडार, व्यापार घाटा आदि जैसे जो आर्थिक आंकड़े बढ़ा चढ़ा कर पेश किये जा रहे हैं वे आम आदमी की समझ के बाहर हैं क्योंकि इस सब तथाकथित उपलब्धियों का आम नागरिकों की जिन्दगी पर कोई बेहतर फर्क नहीं पड़ा है। वैसे तो किसी भी नागरिक को यह कानूनी अधिकार नहीं कि वो सरकार से टैक्स के पैसों के बारे में सवाल कर सके। "कल्याणकारी राज्य" की अवधारणा के चलते कई बार न्यायालय भी यह कह चुके हैं कि सरकार को पूरा अधिकार है कि वह अपने राजस्व और संसाधनों का उपयोग अपनी नीतियों और प्राथमिकताओं के अनुसार कर सके। मगर सरकार की नीतियां कैसी होनी चाहिये, यह महत्वपूर्ण प्रश्न है! आज देश में वोट बैंक के लालच में ऐसी मुफ्तखोरी की योजनाओं की भरमार है जो केन्द्र सरकार के साथ अधिकांश राज्य सरकारों के लिये गले की हड्डी बन चुकी हैं। हालात यह हैं कि सरकारें कर्ज लेकर इस योजनाओं को किसी तरह चलाने पर मजबूर हैं। एक नजरिये से लोक कल्याण के लिये ऐसी नीति का पालन करना उचित है लेकिन यदि सरकार केवल चुनावी लाभ के लिये करे तब यह निस्संदेह अनुचित है। बार बार यह सवाल भी उठाया जाता है कि सरकारी खजाने से ये मुफ्तखोरी कब तक चल पाएगी और इसका देश की अर्थव्यवस्था पर क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा। और यह भी कि ऐसी मुफ्तखोरी से किस तरह का समाज तैयार किया जा रहा है।
यह सही है कि "कल्याणकारी राज्य" होने के नाते सरकार की जिम्मेदारी है कि अति वंचित तबके के लिए भोजन और आवास सुनिश्चित करे। लेकिन बिल्कुल मुफ्त का पैसा बांटने से बेहतर होगा कि वही धनराशि स्कूलों और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर खर्च की जाए क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति बेहद खराब है। किसी भी देश की प्रगति अच्छी शिक्षा और व्यापक स्वास्थ्य सेवाओं पर ही निर्भर है लेकिन सरकारों ने इन पर खर्च को कोई प्राथमिकता नहीं दी है। नतीजा यह कि पिछले दशक में देश भर में करीब एक लाख स्कूल बन्द कर दिये गये हैं। स्वास्थ्य केन्द्रों में दवाओं और स्टॉफ की कमी के कारण ग्रामीण जनता झोलाछाप डॉक्टरों के भरोसे है। सरकारी नौकरियों में लाखों पद खाली हैं लेकिन वेतन का भार झेलने में असमर्थ सरकारें रिक्त पदों को भरना नहीं चाहतीं। वास्तव में शिक्षा और स्वास्थ्य की उचित उपलब्धता न होने का असर उसी वर्ग पर ज्यादा पड़ता है जिसे सरकार मुफ्तखोरी की आदत डाल रही है। यह "इस हाथ दे उस हाथ ले" जैसा परोपकार है।
देश में टैक्स देने वालों की संख्या बढ़ी है और सरकारों की हर ज़रिये से टैक्स वसूलने की मनमानी नीतियों के चलते प्रत्यक्ष तथा परोक्ष दोनों ही प्रकार के टैक्स राजस्व की राशि लगातार बढ़ती जा रही है। मगर अब भी सरकारों की प्राथमिकताएं समय की माँग के मुताबिक नहीं हैं। बेरोजगारी और महंगाई को सिर्फ मुफ्त योजनाओं से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इसके लिये जरूरी है कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अनिवार्य बुनियादी खर्च के साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर, उद्योग और कृषि क्षेत्रों के विकास की बड़ी और दीर्घकालिक योजनाएं शुरू की जाएं। यह अपरिहार्य हो गया है कि सरकार टैक्स के पैसों को खर्च करने में उचित प्राथमिकताएं निश्चित करे। वरना आज नहीं तो तो कल जनता जरूर सवाल करेगी और ऐसा न हो कि देश को यूरोप जैसी स्थितियों का सामना करना पड़े।