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Major High Court decision: Judicial work will not be suspended for the entire day due to a Bar Association condolence motion.
रायपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने न्यायिक कार्यों में अनावश्यक व्यवधान को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि बार एसोसिएशन के शोक प्रस्ताव के आधार पर पूरे दिन की सुनवाई स्थगित नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि ऐसी व्यवस्था न्यायिक प्रक्रिया और समय पर न्याय मिलने के अधिकार के विपरीत है।
मामला रायपुर निवासी सतपाल गांधी की याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता के बेदखली प्रकरण की सुनवाई 2 फरवरी 2026 को तय थी, लेकिन जिला बार एसोसिएशन के शोक प्रस्ताव के कारण रेंट कंट्रोलर ने पूरे दिन का न्यायिक कार्य स्थगित कर दिया। इससे मामले की सुनवाई अगली तारीख पर चली गई। हाईकोर्ट ने इस आदेश को कानून के अनुरूप नहीं मानते हुए निरस्त कर दिया।
हाईकोर्ट ने रेंट कंट्रोलर को निर्देश दिया कि भविष्य में न्यायिक कार्य सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सिद्धांतों के अनुरूप संचालित किए जाएं। अदालत ने कहा कि विशेष रूप से जरूरी मामलों की सुनवाई केवल शोक प्रस्ताव के आधार पर नहीं टाली जानी चाहिए और न्यायिक कार्य प्रभावित नहीं होना चाहिए।
अदालत ने याचिकाकर्ता के लंबित बेदखली प्रकरण का यथासंभव तीन महीने के भीतर निपटारा करने का निर्देश भी दिया। हालांकि रेंट कंट्रोलर के कार्य संचालन की समीक्षा को लेकर राज्य सरकार को कोई बाध्यकारी आदेश जारी नहीं किया गया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि संबंधित प्रकरण में कई बार प्रशासनिक कारणों, पीठासीन अधिकारी की अनुपस्थिति और शोक प्रस्तावों के चलते सुनवाई टलती रही। कोर्ट ने कहा कि इससे त्वरित न्याय का उद्देश्य प्रभावित होता है। मामलों को केवल बार एसोसिएशन के अनुरोध पर यांत्रिक तरीके से स्थगित करना उचित नहीं है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दिवंगत अधिवक्ता या न्यायिक अधिकारी को श्रद्धांजलि देना सम्मानजनक परंपरा है, लेकिन इसके नाम पर पूरे दिन न्यायिक कार्य रोक देना उचित नहीं माना जा सकता। अदालत ने दोहराया कि न्याय तक समय पर पहुंच सुनिश्चित करना न्यायपालिका की प्राथमिक जिम्मेदारी है।