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Major relief for Shiksha Karmis from the High Court... Government's appeal against counting past service for pension dismissed.
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शिक्षाकर्मियों की पेंशन से जुड़े अहम मामले में राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए उसकी रिट अपील खारिज कर दी है। डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि शिक्षाकर्मियों की पुरानी सेवा अवधि को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और इस संबंध में सरकार को ठोस नीतिगत फैसला लेना होगा।
मामला उन शिक्षाकर्मियों से जुड़ा है, जो वर्षों तक संविदा पर कार्य करने के बाद 1 जुलाई 2018 से नियमित शासकीय सेवा में समाहित हुए थे। वर्तमान नियमों के अनुसार पेंशन के लिए कम से कम 10 वर्ष की नियमित शासकीय सेवा आवश्यक है। राज्य सरकार समावेशन की तिथि से ही सेवा अवधि की गणना कर रही थी, जिसके कारण बड़ी संख्या में कर्मचारी 2028 से पहले पेंशन के पात्र नहीं बन पा रहे थे।
इस मामले में पहले सिंगल बेंच ने सरकार को सीधे आदेश देने के बजाय पुनर्विचार कर उचित नीति बनाने का अवसर दिया था। अदालत ने कहा था कि पेंशन एक कल्याणकारी व्यवस्था है और नियमितीकरण से पहले दी गई सेवाओं को पूरी तरह खारिज करना उचित नहीं होगा।राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती देते हुए डिवीजन बेंच में रिट अपील दायर की, लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया।
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि सिंगल बेंच ने किसी प्रकार का न्यायिक अतिक्रमण नहीं किया, बल्कि सरकार को एक आदर्श नियोक्ता के रूप में निर्णय लेने का अवसर प्रदान किया है। चूंकि यह मामला बड़ी संख्या में कर्मचारियों से जुड़ा है, इसलिए शासन स्तर पर स्पष्ट और पारदर्शी नीति बनाई जानी चाहिए।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद राज्य सरकार को शिक्षाकर्मियों की नियमितीकरण से पहले की सेवा अवधि को पेंशन की पात्रता में शामिल करने के मुद्दे पर स्पष्ट निर्णय लेना होगा। यह फैसला प्रदेश के हजारों शिक्षाकर्मियों के लिए भविष्य में पेंशन संबंधी लाभ का रास्ता खोल सकता है।