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Malaria continues to wreak havoc in Bastar; deaths persist despite an expenditure of ₹400 crore; ashram student from Bijapur succumbs.
बीजापुर। बस्तर संभाग में मलेरिया पर नियंत्रण के लिए वर्षों से बड़े स्तर पर अभियान चलाए जाने के बावजूद बीमारी का प्रकोप कम होता नजर नहीं आ रहा है। बीजापुर में जांगला बालक आश्रम के कक्षा पांचवीं के छात्र लस्कर वेट्टी की गंभीर मलेरिया से उपचार के दौरान मौत हो गई। इस घटना ने एक बार फिर मलेरिया नियंत्रण अभियान और आश्रम-छात्रावासों में बच्चों की स्वास्थ्य निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।लस्कर वेट्टी ग्राम हितुलवाड़ा, तहसील भैरमगढ़ निवासी था। वह जांगला स्थित बालक आश्रम में रहकर पढ़ाई कर रहा था। परिजनों के अनुसार उसे करीब एक सप्ताह से बुखार था। हालत बिगड़ने पर उसे उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया, जहां से गंभीर स्थिति को देखते हुए डिमरापाल स्थित बलिराम कश्यप मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर किया गया। उपचार के दौरान सोमवार को उसकी मौत हो गई।
मस्तिष्क तक पहुंच गया था संक्रमण, हालत गंभीर होने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया
चिकित्सकों के अनुसार छात्र गंभीर मलेरिया से संक्रमित था और संक्रमण का असर मस्तिष्क तक पहुंच गया था। ऐसी स्थिति में मरीज की हालत तेजी से बिगड़ सकती है।परिजनों का आरोप है कि छात्र की बीमारी की गंभीरता की जानकारी उन्हें समय रहते नहीं दी गई। शुक्रवार शाम करीब सात बजे उन्हें बुलाकर छात्र को घर भेजा गया। इसके बाद परिजन उसे जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। हालत गंभीर होने पर आगे के उपचार के लिए डिमरापाल रेफर किया गया।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2025 से 20 जुलाई 2026 के बीच बस्तर संभाग में मलेरिया के 34,006 पॉजिटिव मामले दर्ज किए गए। इनमें बीजापुर सबसे ज्यादा प्रभावित रहा।
बीजापुर में इसी अवधि में 12,339 मलेरिया के मामले सामने आए। इनमें 10,597 पीएफ, 1,328 पीवी और 414 मिक्स संक्रमण के मामले शामिल हैं। इसके बाद सुकमा में 5,742 और दंतेवाड़ा में 4,638 मामले दर्ज किए गए।आंकड़े बताते हैं कि संभाग के सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में बच्चों की नियमित जांच और बुखार के मामलों की तत्काल निगरानी कितनी महत्वपूर्ण है।
बीजापुर की घटना ऐसे समय सामने आई है, जब कांकेर जिले में पिछले एक महीने के दौरान मलेरिया से कई स्कूली बच्चों की मौत की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। लगातार हो रही मौतों ने बस्तर क्षेत्र में मलेरिया नियंत्रण की मौजूदा व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा दी है।विशेषज्ञों के अनुसार आश्रम और छात्रावासों में रहने वाले बच्चों की नियमित स्क्रीनिंग, समय पर जांच और शुरुआती लक्षण दिखते ही उपचार शुरू करना बेहद जरूरी है।
मलेरिया मुक्त बस्तर और स्वस्थ बस्तर जैसे अभियानों के तहत पिछले छह वर्षों में बस्तर संभाग के सात जिलों में करीब 400 करोड़ रुपये खर्च किए जाने की जानकारी सामने आई है।मलेरिया की रोकथाम के लिए दवाओं के छिड़काव, मेडिकेटेड मच्छरदानियों के वितरण और स्क्रीनिंग जैसी गतिविधियों पर लगातार संसाधन लगाए गए हैं। इसके बावजूद बीमारी से मौतों का सिलसिला पूरी तरह नहीं थम पाया है।
मलेरिया नियंत्रण अभियान के सामने एक और चुनौती दवाओं की उपलब्धता को लेकर है। जानकारी के अनुसार इस वर्ष कई जिलों में आवश्यक दवाओं की आपूर्ति नहीं होने के कारण मच्छररोधी दवा के छिड़काव का काम समय पर शुरू नहीं हो सका।ऐसे में सवाल उठता है कि जिन क्षेत्रों में मलेरिया का संक्रमण पहले से अधिक है, वहां रोकथाम की गतिविधियां समय पर और पर्याप्त स्तर पर क्यों नहीं पहुंच पा रही हैं।
दूरस्थ क्षेत्रों के आश्रम और छात्रावासों में रहने वाले बच्चे स्वास्थ्य सेवाओं की दृष्टि से विशेष निगरानी की जरूरत रखते हैं। बुखार जैसे सामान्य दिखने वाले लक्षण को भी मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में हल्के में नहीं लिया जा सकता।लस्कर वेट्टी की मौत ने यह सवाल फिर खड़ा किया है कि आश्रम में रहने वाले बच्चों की नियमित स्वास्थ्य जांच कितनी प्रभावी है और बीमारी के शुरुआती संकेत मिलने पर परिजनों तथा स्वास्थ्य विभाग को कितनी जल्दी सूचना दी जाती है।
मलेरिया प्रभावित बस्तर में संसाधनों और अभियानों पर बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद यदि गंभीर संक्रमण के कारण बच्चों की मौत होती है, तो रोकथाम से लेकर उपचार तक पूरी व्यवस्था की जमीनी समीक्षा करना जरूरी हो जाता है।