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Mark sheets were distributed to 1.3 million students without them having taken any exams, and grades for new subjects were assigned in an arbitrary manner.
रायपुर। प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था की गंभीर लापरवाही सामने आई है। करीब 13 लाख विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े इस मामले में बिना परीक्षा कराए ही मार्कशीट में ग्रेड दर्ज कर दिए गए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत पाठ्यक्रम में शामिल किए गए नए विषयों को लेकर शिक्षा विभाग ने किताबें तो उपलब्ध करा दीं, लेकिन उनकी परीक्षा कराने की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की। हैरानी की बात यह है कि परीक्षा नहीं होने के बावजूद विद्यार्थियों के परिणाम तैयार कर दिए गए।
मामला शैक्षणिक सत्र 2024-25 से जुड़ा है। इस दौरान कक्षा तीसरी और छठवीं के विद्यार्थियों के लिए शारीरिक शिक्षा, कला शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था। इन विषयों की परीक्षाएं आयोजित नहीं की गईं, लेकिन विद्यार्थियों की मार्कशीट में ग्रेड दर्ज कर दिए गए।इसके बाद शैक्षणिक सत्र 2025-26 में भी यही लापरवाही दोहराई गई। इस बार कक्षा चौथी और सातवीं की अगस्त-सितंबर में आयोजित तिमाही परीक्षा की समय-सारणी में इन नए विषयों को जगह ही नहीं मिली। इससे स्पष्ट है कि पिछले सत्र की गड़बड़ी से विभाग ने कोई सबक नहीं लिया।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रावधानों के अनुसार वर्ष 2024-25 से चरणबद्ध तरीके से नए विषयों को स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया। शुरुआत में तीसरी और छठवीं कक्षा में इन्हें लागू किया गया। अगले सत्र में चौथी और सातवीं के विद्यार्थियों को भी इन विषयों से जोड़ा गया। आगामी सत्र में पांचवीं और आठवीं कक्षा तक इनका विस्तार करने की योजना है।राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद ने इन विषयों का पाठ्यक्रम तैयार किया। वहीं पाठ्यपुस्तक निगम ने दो शैक्षणिक सत्रों के दौरान करीब 66.96 लाख पुस्तकें छपवाकर विभिन्न जिलों तक पहुंचाईं। विद्यार्थियों की मार्कशीट में भी इन विषयों के लिए अलग से ग्रेडिंग कॉलम बनाए गए। इसके बावजूद परीक्षा आयोजित करने की जिम्मेदारी को लेकर विभागीय स्तर पर स्पष्टता नहीं रही।

परीक्षा नहीं होने की प्रमुख वजह शिक्षा विभाग के अधिकारियों के बीच समन्वय का अभाव सामने आया है। लोक शिक्षण संचालनालय को उम्मीद थी कि जिलों में अन्य विषयों की तरह इन नए विषयों की परीक्षाएं भी स्थानीय स्तर पर आयोजित कराई जाएंगी। दूसरी ओर, जिला शिक्षा अधिकारी राज्य मुख्यालय से स्पष्ट दिशा-निर्देश मिलने की प्रतीक्षा करते रहे।इस खींचतान का नतीजा यह हुआ कि परीक्षा की व्यवस्था ही नहीं बन पाई। हालांकि, मार्कशीट में ग्रेडिंग के लिए पहले से कॉलम मौजूद थे। शिक्षकों ने इन्हें खाली छोड़ने के बजाय विद्यार्थियों के नाम के सामने ग्रेड दर्ज कर दिए।
इस पूरे मामले की पड़ताल के दौरान 11 जिलों के 50 सरकारी स्कूलों में जानकारी जुटाई गई। रायपुर, महासमुंद, गरियाबंद, बलौदाबाजार, जांजगीर, दुर्ग, धमतरी और बस्तर संभाग के कई क्षेत्रों के स्कूलों में शिक्षकों से परीक्षा और मूल्यांकन की प्रक्रिया के बारे में जानकारी ली गई।कई शिक्षकों ने स्वीकार किया कि नए विषयों की लिखित परीक्षा आयोजित नहीं की गई थी। उनका कहना था कि मार्कशीट में ग्रेड भरने के लिए अलग कॉलम दिए गए थे, इसलिए उन्हें खाली छोड़ना उचित नहीं लगा। कुछ शिक्षकों ने यह तर्क भी दिया कि आठवीं कक्षा तक विद्यार्थियों को अनुत्तीर्ण नहीं किया जाता, इसलिए इन विषयों की परीक्षा नहीं होने से परिणाम पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता।लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब स्कूलों में इन विषयों के विशेषज्ञ शिक्षक ही उपलब्ध नहीं हैं, तो विद्यार्थियों को पढ़ाया किसने और उनके प्रदर्शन का आकलन किस आधार पर किया गया?