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Mohan Bhagwat speaks on the NEET controversy... Solutions should emerge from dialogue, not protest.
मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शिक्षा, सामाजिक समरसता और युवा संवाद जैसे मुद्दों पर अपने विचार रखते हुए कहा कि किसी भी विवाद का स्थायी समाधान टकराव से नहीं, बल्कि सार्थक संवाद से निकलता है। उन्होंने युवाओं से समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी निभाने का आह्वान भी किया।
नीट परीक्षा से जुड़े विवाद और विरोध प्रदर्शनों का उल्लेख करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन केवल विरोध के बजाय बातचीत और सकारात्मक प्रयासों के जरिए समाधान तलाशना अधिक प्रभावी होता है। उन्होंने कहा कि हर पक्ष को एक दूसरे की बात सुनने और समझने की जरूरत है।
आरक्षण के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था सामाजिक समानता स्थापित करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी और जब तक समाज में वास्तविक समानता नहीं आती, तब तक इसकी आवश्यकता बनी रहेगी। उनके अनुसार इस विषय पर अनावश्यक विवाद के बजाय सामाजिक संतुलन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
मोहन भागवत ने कहा कि नेतृत्व केवल भाषण देने या चुनाव जीतने तक सीमित नहीं होता। सच्चा नेतृत्व वह है जो समाज के साथ चलकर लोगों को प्रेरित करे, उनकी समस्याओं को समझे और समाधान के लिए ईमानदारी से काम करे। उन्होंने युवाओं से ज्ञान, संवेदनशीलता और सेवा भावना विकसित करने की अपील की।
उन्होंने कहा कि समाज में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन संवाद की परंपरा कभी समाप्त नहीं होनी चाहिए। विभिन्न विचारों के बीच लगातार बातचीत से ही विश्वास मजबूत होता है और बेहतर रास्ते निकलते हैं। उनके अनुसार राष्ट्र निर्माण में सभी वर्गों की सहभागिता और परस्पर सम्मान सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं।
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि देश का भविष्य युवाओं के हाथ में है। यदि युवा सकारात्मक सोच, अनुशासन और समाज के प्रति समर्पण के साथ आगे बढ़ेंगे तो भारत विकास के नए आयाम स्थापित करेगा। उन्होंने युवाओं से व्यक्तिगत सफलता के साथ सामाजिक जिम्मेदारियों को भी समान महत्व देने का आग्रह किया।