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Notice issued to student withdrawn following Supreme Court's stern stance; questions raised regarding the Executive Magistrate.
नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में शामिल एक छात्र को पुलिस की ओर से नोटिस जारी किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने सवाल उठाया कि जब पहले ही स्पष्ट निर्देश दिया जा चुका था कि प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी, तो इसके बावजूद कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी करने की कार्रवाई कैसे कर दी।
मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। आरोप है कि वह 20 से 25 जुलाई के बीच जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में शामिल हुआ था। इसी सिलसिले में गौतम बुद्ध नगर के कार्यपालक मजिस्ट्रेट तृतीय की ओर से चार सितंबर को उसे शांति भंग की आशंका समेत विभिन्न आधारों पर पांच लाख रुपये के मुचलके का नोटिस भेजा गया था।
मामला अदालत के सामने पहुंचने पर प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने नोटिस जारी किए जाने के आधार पर सवाल उठाया। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश पहले ही दिया जा चुका था। ऐसे में उसी मामले में कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा नोटिस जारी करना गंभीर सवाल खड़े करता है।
अदालत ने यह भी पूछा कि जब सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश मौजूद था तो उसके विपरीत कार्रवाई करने की जरूरत क्यों पड़ी। कोर्ट ने संबंधित तथ्यों को रिकॉर्ड पर रखने और मामले में स्पष्टीकरण देने की बात कही।
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद पुलिस ने पांच सितंबर को छात्र को जारी नोटिस वापस ले लिया। पुलिस की ओर से बताया गया कि नोटिस कार्यपालक मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र के तहत जारी किया गया था। हालांकि, अदालत के निर्देश के बाद इसे वापस ले लिया गया।
इस मामले ने न्यायिक आदेशों के पालन और प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई के बीच समन्वय को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ संकेत दिया कि जब किसी मामले में पहले से स्पष्ट न्यायिक निर्देश मौजूद हों, तब उसके विपरीत कार्रवाई स्वीकार नहीं की जा सकती।