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Paper Leak: Side Effects of Poor Justice Process – Dr. Yogendra Srivastava
जबलपुर। एक बार फिर नीट यूजी परीक्षा रद्द कर दी गई। पिछले दस सालों में यह चौथा मौका है जब देश की सर्वाधिक महत्वपूर्ण परीक्षाओं में से एक नीट यूजी में पेपर लीक होने की घटना हुई है। नीट के अलावा पिछले दस सालों में लगभग सौ प्रतियोगी परीक्षाएं रद्द की गई हैं। विश्वगुरु होने का दावा करने वाले देश के लिये यह बेहद शर्मनाक घटना है। प्रतियोगी परीक्षा के पीछे केवल परीक्षार्थियों की मेहनत और महत्वाकांक्षा ही ध्वस्त नहीं होती, उनके परिवार के सपने भी टूटते हैं और सारा त्याग और सम्बल व्यर्थ हो जाता है। साथ ही देश के संसाधनों की बरबादी होती है और छात्रों का बहुमूल्य समय नष्ट होता है। उन्नत टेक्नोलॉजी के दौर में देश एक सुरक्षित और विश्वसनीय परीक्षा प्रणाली विकसित नहीं कर पाता तो यह सिस्टम की घोर असफलता है। समय और संसाधनों की बरबादी के अलावा ऐसी घटनाओं से देश की प्रतिष्ठा हानि भी होती है।
सवाल यह है कि ऐसा होता क्यों है? इसके पीछे कई फैक्टर हैं जैसे छात्रों और उससे ज्यादा उनके परिवारों की महत्वाकांक्षा, गलाकाट प्रतिस्पर्धा, कोचिंग संस्थानों का रैकेट और काला धन। दरअसल पढ़ाई या नौकरी से संबंधित कोई भी प्रतियोगी परीक्षा शिक्षा व्यवस्था के दलालों और कोचिंग रैकेट के सरगनाओं के लिए एक कमाई का मौका बन जाती है। पेपर लीक तो सिर्फ पहली सीढ़ी है, उसके बाद मूल्यांकन में गड़बड़ी, मेरिट लिस्ट में हेराफेरी, अलॉटमेंट में जुगाड़ वगैरह सब पर शिक्षा माफिया का कंट्रोल होता है। अगर कहीं चूक हो जाए तो शोर मच जाता है वरना ये सब घोटाला बदस्तूर चलता रहता है।
लेकिन सबसे बड़ा फैक्टर है; हमारी लचर न्याय प्रक्रिया! समाज के हर क्षेत्र में बढ़ते हुए अपराध वास्तव में कमजोर न्याय प्रक्रिया का साइड इफेक्ट है। मसलन बीसियों बार पेपर लीक हो चुके हैं अथवा नियुक्ति प्रक्रिया रद्द की गई है मगर हमारी सरकारें कुछ सीखती ही नहीं। लोगों को वर्ष 2013 में मध्यप्रदेश का बहुचर्चित और बदनाम व्यापम घोटाला जरूर याद होगा जिसमें अनेक अपात्रों को मेडीकल कॉलेजों में दाखिला और कई अन्य विभागों में नौकरी दिलाई गई थी। मगर यह किसी को याद नहीं होगा कि पुलिस की चार्ज शीट में लगभग 3000 लोगों के नाम होने के बाद बमुश्किल 100 लोगों को सजा हुई। वह भी लम्बी ट्रायल, जमानत और अपील वगैरह के बाद। ऐसा अमूमन हर घोटाले के साथ होता है। पकड़े जाने पर मीडिया में शोरगुल, आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आश्वासन, जाँच और फिर कानूनी प्रक्रिया का लम्बा दौर। कई बार तो आरोप पत्र ही सालों बाद कोर्ट में पेश होता है। इस लेट लतीफी का लाभ लेकर जमानत पर छूटे चतुर अपराधी सबूतों और गवाहों की भूल भुलैया में केस उलझा देते हैं।
आखिर में कुछ लोगों को दण्डित कर मामला खत्म कर दिया जाता है। इस सारी प्रक्रिया में सिस्टम से जुड़े उच्चाधिकारी साफ बच निकलते हैं क्योंकि उनके अलिखित आदेशों का कोई रिकॉर्ड ही नहीं होता। ये तमाशा केवल पेपर लीक और परीक्षाओं के मैनेज करने तक नहीं बल्कि हर तरह के भ्रष्टाचार में दिखाई देता है। ईडी, इन्कम टैक्स, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, जीएसटी वगैरह किसी भी एजेंसी का मामला हो आखिर में अंजाम लगभग यही होता है। डकैती, रेप और हत्या जैसे संगीन अपराधों में भी न्याय प्रक्रिया की कमजोरी और लेट लतीफी आखिर अपराधियों को ही लाभ पहुंचाती है।जनता भी जब-तब उजागर होने वाले नए घोटालों की सनसनी में पुराने मामले भूलती जाती है। अपराधियों के हौसले इस कदर बुलन्द हैं कि आजकल जमानत पर छूटने का भी जश्न मनाया जाता है। जाहिर है कि जमानत पर छूट जाना ही अपराधी के लिए कामयाब हो जाना है क्योंकि मुकदमा तो सालों तक चलना निश्चित ही है। कई अपराधी जमानत पर छूटकर दोबारा भी अपराध कर गुजरते हैं।
अधिकांश घोटाले अथवा अपराध कुछ लोगों तक ही सीमित होते हैं लेकिन जब पेपर लीक या नियुक्ति रद्द होने जैसी घटनाएं होती हैं तो लाखों लोग प्रभावित होते हैं। नीट यूजी की परीक्षा लगभग 22 लाख छात्रों ने महीनों की कड़ी मेहनत झोंक दी होगी। वर्ष 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल में लगभग 25000 नियुक्तियों को निरस्त कर दिया था। हाल में ही मध्यप्रदेश में 13000 प्राथमिक शिक्षकों की चयन सूची पर रोक लगा दी गई है। परीक्षा एवं चयन में गड़बड़ी के ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जब परीक्षार्थियों अथवा प्रतिस्पर्धियों की मेहनत व्यर्थ गई और उनके सपने टूट गए।स्पष्ट है कि अपराधियों, आला अफसरों और राजनेताओं की मिलीभगत के बिना ऐसा होना सम्भव ही नहीं।
खेदजनक तथ्य यह है कि राजनीति और अपराध के गठजोड़ के चलते कानून का डर धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। एक आम आदमी जरूर कानून से डरता है लेकिन अपराधी बेखौफ अपराध करते रहते हैं क्योंकि अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त है। रेत माफिया और जंगल माफिया के पुलिस और अधिकारियों पर हमले उनकी राजनेताओं से सांठ गांठ के उदाहरण हैं। यह समझना मुश्किल नहीं कि अपराधी और राजनेता अब एक दूसरे के हितसाधक हो गए हैं। इससे ज्यादा त्रासद और शर्मनाक क्या होगा कि आपराधिक मामलों में लिप्त सैकड़ों राजनेता विधायक और सांसद बने हुए हैं। न्याय प्रक्रिया की लापरवाही और लेट लतीफी के चलते ऐसे राजनेता कानून के उस सिद्धान्त का सहारा लेते हैं कि; "दोषी साबित होने तक आरोपी निर्दोष है"। बहुतों को आखिरकार सजा होती भी है लेकिन तब तक वे कई महत्वपूर्ण पद सुशोभित कर चुके होते हैं। अपराधियों में कानून का भय खत्म हो जाना समाज के लिए खतरे की घंटी है और इसके परिणाम दिखाई भी देने लगे हैं। अगर समय रहते न्याय प्रक्रिया में व्यापक और वांछित सुधार नहीं किए गए तो यह अनदेखी समाज और देश के लिए बहुत घातक साबित होगी।