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People sleeping on the footpath cannot be held responsible for the accident; compensation will not be reduced: Delhi High Court.
नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि फुटपाथ पर सो रहे या आराम कर रहे लोगों को सड़क दुर्घटना के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई वाहन फुटपाथ पर चढ़कर किसी व्यक्ति को घायल करता है, तो इसे पीड़ित की सहभागी लापरवाही (Contributory Negligence) नहीं माना जाएगा। इसी आधार पर कोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पीड़ितों के मुआवजे में 50 प्रतिशत की कटौती की गई थी।
न्यायमूर्ति अनिश दयाल की एकल पीठ ने कहा कि एमएसीटी द्वारा पीड़ितों को 50 प्रतिशत सहभागी लापरवाही का दोषी ठहराना कानून और तथ्यों के अनुरूप नहीं था। अदालत ने माना कि मुआवजे में इस आधार पर की गई कटौती उचित नहीं थी और पीड़ितों को पूर्ण राहत मिलनी चाहिए।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि फुटपाथ पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित स्थान होता है। वहां चलने, खड़े होने या मजबूरी में आराम करने वाला कोई भी व्यक्ति यह नहीं सोच सकता कि कोई वाहन फुटपाथ पर चढ़ जाएगा। इसलिए वाहन चालक की जिम्मेदारी है कि वह पूरी सावधानी और सतर्कता के साथ वाहन चलाए।
अदालत ने कहा कि देश में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो बेघर हैं या रात में काम करने वाले श्रमिक हैं। उनके पास सुरक्षित स्थान पर सोने की सुविधा नहीं होती, इसलिए वे मजबूरी में फुटपाथ का सहारा लेते हैं। ऐसी परिस्थिति में फुटपाथ पर सोना उनकी लापरवाही नहीं माना जा सकता और इसके आधार पर उन्हें मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता।
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही किसी व्यक्ति ने फुटपाथ का उपयोग उसके मूल उद्देश्य से अलग तरीके से किया हो, लेकिन किसी भी स्थिति में फुटपाथ पर वाहन चलाना कानूनन प्रतिबंधित है। यदि कोई वाहन चालक फुटपाथ पर वाहन चढ़ाता है, तो उसकी जिम्मेदारी तय होगी, न कि वहां मौजूद व्यक्ति की।
यह फैसला सड़क दुर्घटनाओं से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि आर्थिक और सामाजिक मजबूरियों के कारण फुटपाथ पर रहने या सोने वाले लोगों को सड़क हादसों का दोषी नहीं ठहराया जा सकता और उनके वैधानिक अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए।