

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

Privatization of health centers means poison in the name of medicine – Dr. Yogendra Srivastava
खबर है कि मप्र शासन बहुत से सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को निजी संस्थाओं को सौंपने की कवायद कर रहा है जिसके परिणामस्वरुप पहले से जर्जर स्वास्थ्य सेवाओं का और भी महंगा और दुर्लभ होना तय है। संसद की स्थायी समिति की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्राइवेट अस्पताल में इलाज का औसत खर्च रु 50508 है जबकि शासकीय अस्पताल में यही खर्च मात्र रु 6631 होता है। समिति ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि शासकीय अस्पतालों में आधा अधूरा इंफ्रास्ट्रक्चर, बिस्तरों और दवाओं का अभाव, स्टॉफ की कमी आदि ऐसे कारण हैं जिससे आम नागरिक प्राइवेट अस्पतालों के महँगे इलाज का विकल्प चुनने के लिये मजबूर है। खास तौर पर ग्रामीण जनता इससे ज्यादा प्रभावित है। ऐसी स्थिति में सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों का निजीकरण वास्तव में ग्रामीण जनता के लिये एक कड़वी दवा के समान होगा क्योंकि निजीकरण के बाद मामूली बीमारियों के लिये भी उन्हें ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ सकता है।
हैरानी की बात यह है कि संविधान के अनुसार प्रत्येक नागरिक को शिक्षा और स्वास्थ्य की गारंटी दी गई है लेकिन पिछले कई दशक से दोनों ही क्षेत्रों में सरकार का रवैया बेहद उदासीन रहा है। जाहिर है कि केन्द्र और राज्य सरकारें इन क्षेत्रों की जानबूझकर उपेक्षा करती आ रही हैं क्योंकि दोनों ही क्षेत्र सरकारी खर्च तो बढ़ाते हैं लेकिन इनका तात्कालिक वित्तीय लाभ नहीं होता। यद्यपि किसी भी देश के दूरगामी विकास के लिये स्वास्थ्य एवं शिक्षा ही सबसे जरूरी सीढ़ियाँ हैं लेकिन यह गंभीर तथ्य हमारे स्वार्थी और अदूरदर्शी राजनेताओं की समझ से बाहर है।
ज्ञात हो कि सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र ब्लॉक लेवल पर एक छोटा अस्पताल होता है जिसमें खून, पेशाब आदि की शुरुआती जांचों के अलावा एक्सरे आदि की सुविधा भी होती है। जरूरत पड़ने पर मरीजों को भरती करने के इन्तजाम भी होते हैं इन सेवाओं को जारी रखने के लिये चिकित्सक तथा स्टॉफ भी नियुक्त होता है। वास्तव में सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र यानी सीएचसी ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा की महत्वपूर्ण इकाई है। जाहिर है सरकार इन सीएचसी को चलाने में नाकाम रही है इसलिये अब सेवाओं को आउटसोर्स करने की कोशिश की जा रही है। सीधे शब्दों में कहा जाए तो सीएचसी का निजीकरण हो रहा है।
स्पष्ट है कि सरकार अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से बचने का विकल्प तलाश रही है लेकिन इसका दुष्प्रभाव ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा पर पड़ना निश्चित है। पहली बात तो यह है कि जिन संस्थाओं को सीएचसी का ठेका दिया जा सके, उनकी संख्या बहुत कम है और मध्यप्रदेश में तो शायद मिलना ही मुश्किल हो। बहरहाल जो संस्थाएं तैयार होती हैं उन पर निगरानी रखना लगभग नामुमकिन है। जब हमारे अफसर ग्रामीण क्षेत्रों के झोला छाप डॉक्टरों पर कोई रोक नहीं लगा सके तो सीएचसी में पदस्थ किये जाने वाले चिकित्सक और स्टॉफ के सुशिक्षित और प्रशिक्षित होने की निगरानी क्या कर पायेंगे। फिर सेटिंग के दौर में किस अफसर को पड़ी है कि जाकर जांच करे। दवाओं की सप्लाई भले ही सरकार करे लेकिन वो कहां उपयोग की जाएंगी, कौन जाने! डॉक्टर और स्टॉफ की ड्यूटी सरकार तय करेगी या ठेकेदार! संस्था का काम ठीक है या नहीं ये कैसे तय होगा! और अगर काम ठीक नहीं हुआ तो कितनी बार संस्था बदली जायेगी! और बदली गई तो बीच की अवधि में स्वास्थ्य सेवाओं का क्या होगा! ढेरों सवाल हैं लेकिन सरकार को जनता के सवालों से कोई सरोकार नहीं। उसे तो बस अपनी जिम्मेदारी से बचना है और खानापूरी करना है।
असलियत यह है कि स्वास्थ्य नीतियां कागजों पर तो बनाई जाती हैं लेकिन उन पर अमल नहीं होता। ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी स्थायी समस्या है लेकिन इनका समाधान खोजने के व्यावहारिक प्रयास नहीं किये गये। एमबीबीएस के बाद एक साल का अनिवार्य कम्युनिटी एंड इमरजेंसी मेडीसिन कोर्स और छह महीने की ग्रामीण पोस्टिंग करके इसको हल किया जा सकता है। देश में इतने मेडीकल कॉलेज खुल चुके हैं और हर साल लगभग डेढ़ लाख मेडीकल ग्रेजुएट निकल रहे हैं तो इस कार्यक्रम को निरंतरता देने में कोई मुश्किल नहीं होगी। फिर छह माह के लिए ग्रामीण क्षेत्र में जाना युवा डॉक्टरों को इतना मुश्किल भी नहीं लगेगा कि वे जाने से कतराएं।
अफसोस यह है कि राजनेता और प्रशासक यह समझने और मानने को तैयार नहीं कि स्वास्थ्य सेवाओं की कानूनन जिम्मेदारी सरकार की है। तरह तरह के असफल प्रयोग होते हैं मगर आला अफसर हैं कि सबक ही नहीं लेते। जितना पैसा सरकार की लोक लुभावन योजनाओं और ऊलजलूल प्रयोगों पर खर्च होता है, उसी पैसे का उचित उपयोग किया जाये तो स्वास्थ्य सेवाओं में धीरे धीरे गुणात्मक सुधार हो सकता है। वरना निजीकरण जैसी दवा के नाम पर जहर देकर सरकार ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को बिल्कुल चौपट कर देगी।
डॉ योगेन्द्र श्रीवास्तव
जबलपुर
yogendra.shrivastava@gmail.com
9424640999