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Protect yourself against the 'silent disease'—osteoporosis; the risk is higher in women over the age of 45.
हड्डियां कमजोर होने पर दर्द या स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। कई बार मामूली चोट से फ्रैक्चर होने के बाद ही ऑस्टियोपोरोसिस का पता चलता है। इस बीमारी में हड्डियों का घनत्व कम होने लगता है, जिससे उनके टूटने का खतरा बढ़ जाता है। इसीलिए इसे साइलेंट बीमारी कहा जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, बढ़ती उम्र के साथ इसका जोखिम बढ़ता है। हालांकि, कम उम्र में भी यह समस्या हो सकती है, लेकिन महिलाओं में 45 साल के बाद, विशेषकर मेनोपॉज के आसपास हार्मोनल बदलाव के कारण इसका खतरा बढ़ सकता है। ब्लड टेस्ट में केल्शियम या विटामिन-डी की कमी मिलने पर डॉक्टर की सलाह से इसका उपचार कराना चाहिए। आहार में दूध, दही और कैल्शियमयुक्त खाद्य पदार्थ शामिल करने चाहिए। विटामिन-डी के लिए धूप और जरूरत पड़ने पर सप्लीमेंट भी लिए जा सकते हैं। धूम्रपान और अत्यधिक शराब के सेवन से बचना चाहिए। मामूली चोट से फ्रैक्चर होने या लगातार कमर, कूल्हे या कलाई में दर्द रहने पर इसकी डॉक्टरी जांच करानी चाहिए।
एम्स के ऑर्थोपेडिक्स विभाग्ध्यक्ष डॉ. आलोक सी. अग्रवाल के मुताबिक, केवल लक्ष्णों से ऑस्टियोपोरोसिस की पहचान संभव नहीं है। हड्डियों का घनत्व मापने के लिए डेक्सा स्कैन किया जाता है। एक्स-रे से फ्रैक्चर या हड्डियों में स्पष्ट बदलाव का पता चल सकता है। डेक्सा स्कैन की सुविधा सभी जगह उपलब्ध नहीं है। इसकी जांच में करीब 1500 रुपए या उससे अधिक खर्च हो सकते हैं, जबकि एम्स में यह जांच नि:शुल्क है। ऑस्टियोपोरोसिस के निदान और उपचार की दिशा में बड़े स्तर पर काम किया जा रहा है।
वहीं रायपुर के अंबेडकर अस्पताल के ऑर्थोपेडिक्स विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. राजेंद्र अहिरे के अनुसार, विटामिन- डी की कमी, पर्याप्त धूप नहीं मिलना, असंतुलित आहार और शारीरिक गतिविधियों का अभाव हड्डियों को कमजोर कर सकता है। वोल्फ के नियम के मुताबिक, हड्डियां उन पर पड़ने वाले भार के अनुरूप खुद को ढालती हैं। इसीलिए नियमित पैदल चलना, व्यायाम करना और मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाली गतिविधियां हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होती हैं।