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Rajnandgaon's daughter Gyaneshwari Yadav won silver at the 2026 Commonwealth Games.
राजनांदगांव। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव की होनहार वेटलिफ्टर ज्ञानेश्वरी यादव ने राष्ट्रमंडल खेल-2026 में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत की झोली में रजत पदक डाल दिया। स्कॉटलैंड के ग्लास्गो में सोमवार को आयोजित महिला 53 किलोग्राम वेटलिफ्टिंग स्पर्धा में ज्ञानेश्वरी ने कुल 199 किलोग्राम वजन उठाकर दूसरा स्थान हासिल किया। उन्होंने स्नैच में 88 किलोग्राम और क्लीन एंड जर्क में 111 किलोग्राम वजन उठाया।
इस स्पर्धा का स्वर्ण पदक नाइजीरिया की ओनोमे ओमोलोला डिडिह ने कुल 206 किलोग्राम वजन उठाकर अपने नाम किया, जबकि कनाडा की रेबेका ग्रूलक्स ने 178 किलोग्राम के साथ कांस्य पदक जीता।
भाई से किया वादा निभाया
ज्ञानेश्वरी की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि प्रतियोगिता से पहले उनका परिवार कठिन दौर से गुजर रहा था। उनके भाई रितेश यादव सड़क दुर्घटना में घायल होकर अस्पताल में भर्ती हैं और माता-पिता उनकी देखभाल में लगे हुए हैं।
ज्ञानेश्वरी ने प्रतियोगिता से पहले भाई से फोन पर बात कर उसके जल्द स्वस्थ होने की कामना की थी और पदक जीतकर लौटने का वादा किया था। उन्होंने अपने प्रदर्शन से यह वादा पूरा कर पूरे परिवार का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया।
संघर्ष की कहानी बनी प्रेरणा
ज्ञानेश्वरी यादव की सफलता के पीछे वर्षों का कठिन संघर्ष, परिवार का त्याग और पिता की मेहनत छिपी हुई है। उनकी खेल यात्रा किसी आधुनिक स्पोर्ट्स अकादमी से नहीं, बल्कि राजनांदगांव की जय भवानी व्यायामशाला से शुरू हुई थी।
उनके पिता दीपक यादव, जो स्वयं बॉडी बिल्डिंग से जुड़े रहे हैं, बेटी को बचपन से ही अपने साथ व्यायामशाला ले जाते थे। सातवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान ज्ञानेश्वरी ने वेटलिफ्टिंग की शुरुआत की। उनकी लगन देखकर पिता ने कोच अजय लोहार से प्रशिक्षण दिलाने का निर्णय लिया और वहीं से उनके अंतरराष्ट्रीय सफर की नींव पड़ी।
आर्थिक तंगी के बावजूद नहीं टूटा हौसला
परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद साधारण थी। दीपक यादव इलेक्ट्रिशियन का काम कर हर महीने केवल तीन से पांच हजार रुपये कमाते थे। इसी सीमित आय में पूरे परिवार का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और ज्ञानेश्वरी की महंगी डाइट, खेल सामग्री, जूते तथा प्रतियोगिताओं का खर्च उठाना आसान नहीं था।
कई बार परिवार ने अपनी जरूरतों से समझौता किया, लेकिन बेटी के प्रशिक्षण और सपनों में कभी कमी नहीं आने दी।
एक साइकिल पर तय होता था संघर्ष का सफर
राजनांदगांव के पास स्थित ग्राम भोड़िया से दीपक यादव रोज सुबह बच्चों को लेकर करीब आठ किलोमीटर साइकिल से शहर आते थे। बच्चे स्कूल जाते, फिर कई घंटों तक व्यायामशाला में अभ्यास करते। देर रात पूरा परिवार एक ही साइकिल से वापस गांव लौटता था।
घर पर मां दुर्गा यादव सीमित संसाधनों में पूरे परिवार की जिम्मेदारी निभाती रहीं और हर दिन बेटी के बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष करती रहीं।
पिता ने 20-20 घंटे तक किया काम
ज्ञानेश्वरी के पिता बताते हैं कि कई बार उन्होंने लगातार 20-20 घंटे तक काम किया ताकि बेटी की डाइट और तैयारी में कोई कमी न आए। पासपोर्ट बनवाने से लेकर विदेश प्रतियोगिताओं में भेजने तक हर जिम्मेदारी उन्होंने पूरी ईमानदारी से निभाई। उन्हें हमेशा विश्वास था कि संघर्ष ही बेटी की सबसे बड़ी ताकत बनेगा।
2022 से लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमक रहीं ज्ञानेश्वरी
ज्ञानेश्वरी यादव वर्ष 2022 से लगातार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का नाम रोशन कर रही हैं। ग्रीस में आयोजित जूनियर विश्व वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

इसके बाद उन्होंने कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में जूनियर और सीनियर दोनों वर्गों में स्वर्ण पदक जीतकर अपनी प्रतिभा साबित की। वर्तमान में वह पटियाला स्थित नेताजी सुभाष राष्ट्रीय खेल संस्थान (NIS) में प्रशिक्षण ले रही हैं।
खेल उपलब्धियों के दम पर मिली सरकारी नौकरी
ज्ञानेश्वरी की उपलब्धियों को देखते हुए वर्ष 2023 में छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें सहायक उप निरीक्षक (ASI) के पद पर नियुक्त किया। हालांकि नौकरी मिलने के बाद भी परिवार की आर्थिक चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं हुईं। राजनांदगांव में लिया गया मकान अभी भी ऋण पर है और पूरा परिवार मिलकर उसकी किस्त चुका रहा है।
पहला कांस्य पदक बना था टर्निंग प्वाइंट
ज्ञानेश्वरी के करियर का पहला बड़ा मोड़ वर्ष 2017 में आया, जब उन्होंने दुर्ग में आयोजित राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता। उसी सफलता ने परिवार का विश्वास मजबूत किया कि बेटी अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच सकती है।
इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन करते हुए आज राष्ट्रमंडल खेलों में रजत पदक जीतकर छत्तीसगढ़ और देश का गौरव बढ़ाया।
परिवार ने छोड़ी कई खुशियां
ज्ञानेश्वरी के पिता बताते हैं कि कई वर्षों तक परिवार उनका जन्मदिन भी नहीं मना पाया। दोस्तों के साथ घूमना, पारिवारिक समारोहों में शामिल होना और सामान्य जीवन की कई खुशियों का त्याग उन्होंने केवल खेल के लिए किया। उनकी दुनिया स्कूल, व्यायामशाला और बारबेल तक सीमित रही।
आज उसी तपस्या और समर्पण का परिणाम है कि राजनांदगांव की यह बेटी राष्ट्रमंडल खेल-2026 में भारत के लिए रजत पदक जीतकर पूरे देश को गौरवान्वित कर रही है। यह पदक केवल एक खिलाड़ी की सफलता नहीं, बल्कि संघर्ष, त्याग, मेहनत और अटूट विश्वास की प्रेरणादायक कहानी है।