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Supreme Court: Supreme Court takes a stern view on the CG Gondaiah Anicut tender dispute; seeks a response from the state government.
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के बिल्हा ब्लॉक स्थित गोंदैया एनीकट निर्माण कार्य के टेंडर को बार-बार निरस्त किए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच ने छत्तीसगढ़ सरकार से जवाब तलब किया है और राज्य सरकार को 10 अगस्त 2026 तक अपना पक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। यह मामला टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितता, मनमानी और पारदर्शिता पर सवालों को लेकर चर्चा में है।
मेसर्स विनीत सिंह कंस्ट्रक्शन कंपनी प्राइवेट लिमिटेड ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की है। कंपनी का कहना है कि हाई कोर्ट ने टेंडर प्रक्रिया को मनमाना और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना, लेकिन ठेका आवंटित करने के बजाय केवल 1 लाख रुपये का मुआवजा देकर राहत सीमित कर दी, जो न्यायोचित नहीं है।
जल संसाधन विभाग ने बिलासपुर जिले के बिल्हा विकासखंड में गोंदैया एनीकट निर्माण कार्य के लिए निविदा जारी की थी। याचिकाकर्ता कंपनी ए-5 श्रेणी की पंजीकृत ठेकेदार है और उसने टेंडर के पहले तथा दूसरे दोनों कॉल में भाग लिया।
CG Gondaiya Anicut Case: दोनों बार कंपनी ने एल-1 (L-1) यानी सबसे कम बोली लगाई, जो निर्धारित शेड्यूल दर से 18 प्रतिशत अधिक थी। कार्यपालन अभियंता, अधीक्षण अभियंता और प्रमुख अभियंता ने भी कंपनी के प्रस्ताव को स्वीकृत करने की सिफारिश की थी। इसके बावजूद टेंडर मूल्यांकन समिति ने दरों को अधिक बताते हुए बिना कोई स्पष्ट और ठोस कारण बताए दोनों बार निविदा रद्द कर दी।
याचिकाकर्ता कंपनी का आरोप है कि जल संसाधन विभाग ने समान प्रकृति के अन्य निर्माण कार्यों में 18 प्रतिशत से अधिक दरों पर भी टेंडर स्वीकृत किए हैं, जबकि उनके मामले में बिना उचित कारण टेंडर निरस्त कर दिया गया। कंपनी ने इसे मनमाना, पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण निर्णय बताया है।
मामले की सुनवाई छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल शामिल थे, ने की थी।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने माना कि, कंपनी दोनों बार एल-1 बोलीदाता थी। तकनीकी अधिकारियों ने कंपनी के प्रस्ताव की अनुशंसा की थी। इसके बावजूद बिना ठोस कारण के टेंडर रद्द करना मनमाना, गैर-पारदर्शी और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
हालांकि, संविदात्मक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमित सीमा का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने सरकार को टेंडर आवंटित करने का निर्देश नहीं दिया। इसके बजाय कंपनी को हुई असुविधा और नुकसान को देखते हुए राज्य सरकार के जल संसाधन विभाग को 1 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
हाई कोर्ट द्वारा केवल मुआवजा दिए जाने और टेंडर आवंटित करने का आदेश नहीं देने के खिलाफ कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की है। बीते सोमवार 27 जुलाई को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत प्रारंभिक दलीलें सुनीं। इसके बाद अदालत ने मामले में राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा और अगली सुनवाई के लिए 10 अगस्त 2026 की तारीख तय की।