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Road Accident: Hospitals cannot refuse treatment to road accident victims... High Court rules—save lives first, complete formalities later.
लखनऊ। सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को इलाज के लिए अस्पताल से लौटाना या कानूनी औपचारिकताओं के नाम पर उपचार में देरी करना स्वीकार्य नहीं है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि हादसे के बाद घायल को तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना अस्पताल और डॉक्टर की जिम्मेदारी है। मेडिको-लीगल प्रक्रिया या पुलिस कार्रवाई का हवाला देकर उपचार रोकना नहीं जा सकता।कोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी बताने को कहा है कि सरकारी और निजी अस्पतालों में इन निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्था बनाई गई है और इसकी निगरानी कैसे की जा रही है।
न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजिव शुक्ल की पीठ ने अंजू प्रकाश श्रीवास्तव की वर्ष 2000 में दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिए। करीब 25 वर्षों तक जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं किए जाने पर कोर्ट ने नाराजगी जताई।अदालत ने राज्य सरकार को 10 दिन के भीतर जवाब दाखिल करने और याचिकाकर्ता को 25 हजार रुपये हर्जाना देने का आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 1 अक्टूबर को होगी।
कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक चिकित्सक का सबसे महत्वपूर्ण दायित्व जीवन की रक्षा करना है। दुर्घटना में घायल व्यक्ति को सरकारी हो या निजी अस्पताल, तत्काल उपचार मिलना चाहिए। किसी कानूनी प्रक्रिया या अन्य औपचारिकता के कारण इलाज में देरी नहीं होनी चाहिए।सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2016 के सेव लाइफ फाउंडेशन मामले में दिए गए फैसले और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के 12 मई 2015 के गुड समैरिटन दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया गया।इन दिशा-निर्देशों के अनुसार आपात स्थिति में सड़क हादसे के घायल को उपचार देने से इनकार करना पेशेवर कदाचार माना जा सकता है और संबंधित डॉक्टर के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी हो सकती है।
कोर्ट ने राज्य सरकार से यह बताने को कहा है कि इन प्रावधानों की जानकारी सरकारी और निजी अस्पतालों तक पहुंचाने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट करने को कहा गया है कि नियमों के पालन की निगरानी के लिए कौन सा तंत्र बनाया गया है।याचिका के साथ वर्ष 2000 में लखनऊ के एक अस्पताल की तस्वीर भी पेश की गई थी, जिसमें मेडिको-लीगल, दुर्घटना और जलने के मामलों में मरीजों के उपचार को लेकर आपत्तिजनक सूचना प्रदर्शित होने का उल्लेख था।
इसी मुद्दे से जुड़ा एक दर्दनाक मामला छत्तीसगढ़ के कुम्हारी से सामने आया है। सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल धर्मेंद्र विश्वकर्मा ने बुधवार देर रात एम्स रायपुर में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। हादसे में उनके दोनों पैर बुरी तरह कुचल गए थे और लगातार खून बह रहा था।घटना के बाद उन्हें तत्काल नजदीकी सक्षम अस्पताल ले जाने के बजाय पहले सुपेला और फिर जिला अस्पताल दुर्ग ले जाया गया। इसके बाद उन्हें एम्स रायपुर रेफर किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय बीत गया।
जानकारी के अनुसार, हादसे के बाद 112 की टीम मौके पर पहुंची थी। धर्मेंद्र के दोनों पैरों से लगातार खून बह रहा था। ऐसे में सबसे पहले रक्तस्राव रोकने के लिए प्राथमिक उपचार की जरूरत थी। लेकिन उन्हें नजदीकी चिकित्सा सुविधा में तत्काल उपचार देने के बजाय दूसरे अस्पतालों में रेफर किया गया।दुर्ग जिला अस्पताल पहुंचने के बाद उनके पैरों की पट्टी की गई और आगे के इलाज के लिए एम्स रायपुर भेजा गया। एम्स पहुंचने तक अत्यधिक रक्तस्राव के कारण उनकी हालत बेहद गंभीर हो चुकी थी।
धर्मेंद्र की मौत ने आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था में रेफरल प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े किए हैं। गंभीर घायल को सबसे पहले उस नजदीकी अस्पताल में तत्काल प्राथमिक उपचार मिलना जरूरी है, जहां उसकी जान बचाने के लिए जरूरी सुविधा उपलब्ध हो।ऐसे मामलों में सवाल केवल रेफर किए जाने का नहीं, बल्कि इस बात का है कि मरीज को स्थिर करने और जान बचाने वाला शुरुआती उपचार कितनी जल्दी मिला। हाई कोर्ट की टिप्पणी भी इसी व्यापक सिद्धांत पर जोर देती है कि कानूनी औपचारिकताओं के कारण आपातकालीन इलाज में देरी नहीं होनी चाहिए।