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Sabarimala Case: Debate on women's entry resumes in Supreme Court, 9-judge bench begins hearing
नई दिल्ली। देश के चर्चित सबरीमाला मंदिर विवाद पर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है। सुप्रीम कोर्ट की 9 न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ इस बात पर विचार कर रही है कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर 2018 का फैसला जारी रखा जाए या नहीं।
2018 के फैसले के बाद शुरू हुआ नया कानूनी अध्याय
गौरतलब है कि 2018 में 5 जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था। इसके बाद दायर पुनर्विचार याचिकाओं के आधार पर अब इस मामले में कई महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों पर गहन बहस हो रही है।
सुनवाई में उठे 7 बड़े संवैधानिक सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 7 अहम प्रश्न तय किए हैं, जिन पर सुनवाई हो रही है:
अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा क्या है
अनुच्छेद 25 और 26 के अधिकारों का आपसी संबंध
क्या धार्मिक संस्थाओं के अधिकार अन्य मौलिक अधिकारों से ऊपर हैं
‘नैतिकता’ और ‘संवैधानिक नैतिकता’ की परिभाषा
धार्मिक प्रथाओं में न्यायिक दखल की सीमा
‘हिंदुओं के वर्ग’ का अर्थ
क्या कोई बाहरी व्यक्ति धार्मिक प्रथाओं को चुनौती दे सकता है
केंद्र सरकार का पक्ष: आस्था के मामले में हस्तक्षेप नहीं
सुनवाई के पहले दिन केंद्र सरकार की ओर से तुषार मेहता ने दलील दी कि यह मामला धार्मिक आस्था और परंपरा से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि 2018 का फैसला सही तरीके से नहीं लिया गया था।
उनका तर्क था कि महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना अपमान नहीं, बल्कि एक विशेष परंपरा का हिस्सा है। इसे ‘अस्पृश्यता’ कहना गलत है, क्योंकि छुआछूत जाति आधारित भेदभाव से जुड़ा होता है, जबकि यह मामला उससे अलग है।
पीठ की सख्त टिप्पणी: क्या यह छुआछूत नहीं?
सुनवाई के दौरान पीठ की सदस्य जस्टिस नागरत्ना ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर महिलाओं को मासिक धर्म के आधार पर मंदिर में प्रवेश से रोका जाता है, तो क्या यह छुआछूत जैसा व्यवहार नहीं है।
उन्होंने कहा कि संविधान में छुआछूत को पूरी तरह समाप्त किया गया है और किसी भी स्थिति में ऐसा भेदभाव स्वीकार्य नहीं हो सकता। यह नहीं हो सकता कि कुछ दिनों तक महिला को अशुद्ध मानकर रोका जाए और फिर उसे सामान्य रूप से प्रवेश दिया जाए।
आस्था बनाम समानता: फैसला तय करेगा दिशा
यह मामला धार्मिक परंपरा और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन का बड़ा उदाहरण बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला न केवल सबरीमाला मंदिर, बल्कि देशभर में धार्मिक प्रथाओं और महिलाओं के अधिकारों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।