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Security for politicians to be reduced; 1,550 personnel are currently deployed for the protection of 400 public representatives.
रायपुर। छत्तीसगढ़ में सशस्त्र नक्सलवाद खत्म होने की घोषणा के बाद अब सरकार नेताओं और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव करने जा रही है। प्रदेश में लंबे समय से नक्सली खतरे के चलते नेताओं को दी जा रही सुरक्षा का स्तर अब धीरे-धीरे कम किया जाएगा। गृह मंत्री विजय शर्मा ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षा घटाने का फैसला लिया जा चुका है। अब केवल इसकी अंतिम आधिकारिक सूचना जारी होना बाकी है। सरकार एक साथ सभी नेताओं की सुरक्षा हटाने के बजाय चरणबद्ध तरीके से सुरक्षा का स्तर कम करेगी।
इस फैसले को लेकर प्रदेश में राजनीतिक बहस भी शुरू हो गई है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने सरकार के निर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा है कि नेताओं की सुरक्षा घटाने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। अगर सुरक्षा कम होने के बाद किसी जनप्रतिनिधि के साथ कोई अप्रिय घटना होती है, तो इसकी जिम्मेदारी सरकार को लेनी होगी। ऐसे में अब सवाल यह है कि क्या नक्सलवाद खत्म होने के बाद नेताओं को दी जा रही भारी सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत पहले जैसी रह गई है या फिर बस्तर जैसे संवेदनशील इलाकों में अभी भी विशेष सतर्कता जरूरी है?
6 महीने की समीक्षा के बाद सुरक्षा घटाने का फैसला
गृह मंत्री विजय शर्मा ने बताया कि सरकार ने 31 मार्च 2026 की समयसीमा के साथ प्रदेश से सशस्त्र नक्सलवाद समाप्त करने का लक्ष्य तय किया था। इसके तुरंत बाद नेताओं की सुरक्षा पूरी तरह हटा देना उचित नहीं होता। इसलिए सरकार ने अगले 6 महीने तक सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा और निगरानी की।
अब इस समीक्षा के बाद सुरक्षा का स्तर एक ग्रेड कम करने का फैसला लिया गया है। इसके तहत Z+ सुरक्षा प्राप्त लोगों को Z श्रेणी में किया गया है। इसी तरह Z श्रेणी की सुरक्षा को Y+ और Y+ श्रेणी की सुरक्षा को Y श्रेणी में बदला गया है।
सरकार की योजना के मुताबिक, आने वाले 6 महीनों में सुरक्षा का स्तर एक बार फिर एक ग्रेड कम किया जाएगा। यानी फिलहाल किसी की सुरक्षा अचानक पूरी तरह खत्म नहीं की जा रही है, बल्कि खतरे के आकलन के आधार पर धीरे-धीरे सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव किया जाएगा।
दीपक बैज ने उठाए सवाल, बोले- घटना हुई तो सरकार होगी जिम्मेदार
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने सरकार के इस फैसले पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि नक्सलवाद पूरी तरह खत्म होने का दावा करने के बावजूद अभी भी कुछ नक्सली मौजूद हैं। दबाव के चलते कुछ नक्सली दूसरे राज्यों में चले गए होंगे, लेकिन इससे भविष्य में खतरे की आशंका पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाती।
बैज ने कहा कि कांग्रेस भी चाहती है कि प्रदेश में नक्सलवाद दोबारा पैर न पसारे, लेकिन नेताओं और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा कम करने से पहले एक बार फिर गंभीरता से आकलन किया जाना चाहिए।
उन्होंने विशेष रूप से बस्तर का जिक्र करते हुए कहा कि वहां के जनप्रतिनिधियों और नेताओं को लगातार अंदरूनी इलाकों में जाना पड़ता है। ऐसे में उनकी सुरक्षा कम करने का फैसला जल्दबाजी में नहीं होना चाहिए।
दीपक बैज ने विधानसभा चुनाव के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि चुनाव के समय भाजपा नेताओं को अतिरिक्त सुरक्षा दी गई थी, जबकि कांग्रेस नेताओं को वैसी सुरक्षा नहीं मिली थी। इसके बावजूद कांग्रेस ने उस समय विरोध नहीं किया। बैज के मुताबिक, अगर सरकार जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा घटाती है, तो उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी सरकार को लेनी होगी।
400 नेताओं की सुरक्षा में 1550 से ज्यादा जवान, हर साल 150 करोड़ खर्च
छत्तीसगढ़ में नेताओं और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा व्यवस्था पर हर साल बड़ी रकम खर्च होती है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, प्रदेश में करीब 400 नेताओं की सुरक्षा में 1550 से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात हैं। इसके अलावा 500 से अधिक वाहन भी सुरक्षा व्यवस्था में लगाए गए हैं।
इन जवानों के वेतन, वाहनों और अन्य व्यवस्थाओं पर हर साल करीब 150 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। यानी नेताओं की सुरक्षा पर होने वाला यह खर्च राज्य के पुलिस संसाधनों और बजट का एक बड़ा हिस्सा है।
सबसे ज्यादा सुरक्षा व्यवस्था नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग में देखने को मिलती है। यहां 250 से ज्यादा नेताओं और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा में 1000 से अधिक जवान तैनात हैं। बस्तर में इनकी तैनाती और वाहनों पर सालाना करीब 100 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
नक्सलवाद के खतरे के चलते बस्तर में छोटे स्तर के नेताओं को भी Y श्रेणी की सुरक्षा दी गई थी। वहीं कुछ बड़े नेताओं और उनके परिवारों को Z+ जैसी उच्च श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई है।
एक तरफ पुलिस बल की कमी, दूसरी तरफ नेताओं की सुरक्षा में हजारों जवान
नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव की चर्चा के बीच प्रदेश पुलिस बल की स्थिति भी अहम हो गई है। आंकड़ों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ पुलिस में करीब 84 हजार पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें 20 हजार से ज्यादा पद लंबे समय से खाली हैं।
ऐसे में एक तरफ पुलिस विभाग में हजारों पद खाली हैं, वहीं दूसरी तरफ 1550 से अधिक पुलिसकर्मी नेताओं की सुरक्षा में तैनात हैं। सरकार के सामने अब पुलिस बल के बेहतर उपयोग और सुरक्षा व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने की चुनौती भी है।
देश में जम्मू-कश्मीर के बाद छत्तीसगढ़ को नेताओं की सुरक्षा में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती वाले राज्यों में दूसरे स्थान पर बताया जाता है।
सरकार की योजना के मुताबिक, पहले चरण में सुरक्षा का स्तर एक ग्रेड कम किया जा चुका है। अगले 6 महीनों में फिर समीक्षा होगी और इसके बाद सुरक्षा में एक और ग्रेड की कटौती की जा सकती है।
हालांकि, बस्तर के अंदरूनी इलाकों में नेताओं की आवाजाही, नक्सलियों की मौजूदा स्थिति और भविष्य में संभावित खतरे को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था का आकलन महत्वपूर्ण रहेगा।
फिलहाल इस फैसले ने प्रदेश में दो अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला, नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के बाद क्या नेताओं की सुरक्षा पर खर्च होने वाले 150 करोड़ रुपये और हजारों पुलिस संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा? दूसरा, सुरक्षा घटाने के दौरान जनप्रतिनिधियों की व्यक्तिगत सुरक्षा और संभावित खतरे के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा?