

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

Significant Chhattisgarh High Court ruling: Registration of a gift deed alone is not enough for a gift; handing over possession is mandatory.
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हिबा (दान) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल गिफ्ट डीड का पंजीयन कराने या दस्तावेज में संपत्ति का कब्जा सौंपने का उल्लेख कर देने मात्र से हिबा पूर्ण नहीं माना जा सकता। दान की गई संपत्ति का वास्तविक और प्रभावी कब्जा प्राप्तकर्ता को सौंपना आवश्यक है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने रायपुर के 11वें जिला न्यायाधीश के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। जिला न्यायालय ने ससुर की ओर से पत्नी और बेटियों के पक्ष में की गई गिफ्ट डीड को शून्य घोषित किया था।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हिबा को वैध बनाने के लिए केवल दस्तावेजी प्रक्रिया पर्याप्त नहीं है। हिबा के लिए दानकर्ता द्वारा संपत्ति का वास्तविक कब्जा प्राप्तकर्ता को सौंपना भी जरूरी है। यदि संपत्ति का वास्तविक कब्जा हस्तांतरित नहीं किया गया है, तो केवल पंजीकृत दस्तावेज के आधार पर हिबा को वैध नहीं माना जा सकता।
मामला रायपुर के खनिज नगर, पुरैना-तेलीबांधा क्षेत्र की संपत्ति से जुड़ा है। मामले में गिफ्ट डीड में संपत्ति का कब्जा सौंपे जाने का उल्लेख किया गया था, लेकिन अदालत के समक्ष यह साबित नहीं हो सका कि वास्तव में संपत्ति का कब्जा प्राप्तकर्ताओं को हस्तांतरित किया गया था। कोर्ट ने माना कि सिर्फ कागजों में कब्जा देने का उल्लेख वास्तविक कब्जा हस्तांतरण का विकल्प नहीं हो सकता।
इस मामले में स्वर्गीय नौशाद अली की पत्नी नसीमा अली और उनके दो नाबालिग बच्चों की ओर से ट्रायल कोर्ट में सिविल वाद दायर किया गया था। विवाद रायपुर के खनिज नगर, पुरैना-तेलीबांधा इलाके में स्थित संपत्ति को लेकर था।
ट्रायल कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद संबंधित गिफ्ट डीड को शून्य घोषित कर दिया था। इसके बाद इस फैसले को चुनौती देते हुए अपील की गई।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद जिला न्यायालय के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की बेंच ने अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
इस फैसले से यह बात एक बार फिर स्पष्ट हुई कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हिबा को प्रभावी बनाने के लिए केवल पंजीकृत दस्तावेज पर्याप्त नहीं है। दान की घोषणा, प्राप्तकर्ता की स्वीकृति और संपत्ति का वास्तविक कब्जा सौंपना महत्वपूर्ण तत्व हैं।