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Snakebite compensation scam probe reaches senior officials... Questions raised over the roles of the ADM and SDM.
बिलासपुर। जिले के बहुचर्चित सर्पदंश मुआवजा घोटाले की जांच अब प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंच गई है। मामले में तहसील और एसडीएम कार्यालय के तीन लिपिकों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस अब एडीएम, एसडीएम और तहसीलदार स्तर के अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल कर रही है।जांच एजेंसियों को आशंका है कि बिना अधिकारियों की अनुशंसा और हस्ताक्षर के करोड़ों रुपये का मुआवजा जारी नहीं हो सकता था। इसी आधार पर पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि फर्जी दस्तावेजों को किस स्तर पर मंजूरी मिली और पूरी प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ी।
जांच में सामने आया है कि वर्ष 2021 से 2024 के बीच जिले में सामान्य मौतों को सर्पदंश से हुई मौत बताकर कुल 431 प्रकरण तैयार किए गए। इन मामलों के आधार पर करीब 17 करोड़ 24 लाख रुपये का मुआवजा जारी होने का आरोप है।आरोप है कि फर्जी मर्ग नंबर, कूटरचित पोस्टमार्टम रिपोर्ट और गलत नाम-पते के सहारे हार्ट अटैक, आत्महत्या या अन्य कारणों से हुई मौतों को सर्पदंश का मामला बनाकर सरकारी राशि हासिल की गई।
मामले में अब तक कई लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें सिम्स की पूर्व चिकित्सक डॉ. प्रियंका सोनी, तहसील कार्यालय के लिपिक नरेंद्र कौशिक, गरीबराम बिंझवार और हरिशंकर राठौर, तहसील से अटैच ड्राइवर गोविंद विश्वकर्मा सहित अन्य आरोपी शामिल हैं।इसके अलावा मृतकों के परिजनों, कथित वकीलों, बैंककर्मी, नगर सैनिक और अन्य बिचौलियों पर भी कार्रवाई हुई है।पुलिस अब सिम्स के चार से पांच चिकित्सकों के साथ वहां तैनात नगर सैनिकों और होमगार्ड जवानों से भी पूछताछ की तैयारी कर रही है।
एसएसपी रजनेश सिंह के अनुसार, जांच में एक संगठित नेटवर्क का खुलासा हुआ है। सिम्स अस्पताल में शव पहुंचने के बाद वहां तैनात कुछ सुरक्षा कर्मी और नगर सैनिकों की ओर से वकीलों व बिचौलियों को सूचना दी जाती थी।इसके बाद मृतक के परिवारों से संपर्क कर उन्हें सरकारी सहायता दिलाने का झांसा दिया जाता था। कई मामलों में भरोसा जीतने के लिए अंतिम संस्कार के लिए तत्काल कुछ राशि भी दी जाती थी।इसके बाद फर्जी दस्तावेज तैयार कर सर्पदंश मुआवजे की राशि निकालने का खेल चलता था।
पुलिस अब यह जांच कर रही है कि मुआवजा प्रकरणों में एडीएम, एसडीएम, तहसीलदार और पटवारियों की ओर से की गई अनुशंसा और हस्ताक्षरों की प्रक्रिया क्या थी।जांच का मुख्य बिंदु यह है कि इतनी बड़ी संख्या में फर्जी मामलों को प्रशासनिक स्तर पर कैसे मंजूरी मिलती रही।
बिलासपुर कलेक्टर संजय अग्रवाल ने बताया कि सर्पदंश मुआवजा वितरण में गड़बड़ी की शिकायतों के बाद प्रशासनिक जांच कराई गई थी। कुल 17 शिकायतों की जांच के बाद 16 मामलों में एफआईआर दर्ज की गई है।उन्होंने कहा कि मामले की जांच जारी है और दोषियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
शुरुआत में यह मामला कुछ कर्मचारियों और बिचौलियों तक सीमित माना जा रहा था, लेकिन जांच आगे बढ़ने के साथ अब प्रशासनिक अधिकारियों और अस्पताल से जुड़े लोगों की भूमिका भी जांच के घेरे में आ गई है। पुलिस का कहना है कि जांच में जो भी दोषी मिलेगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।