

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

Supreme Court's historic decision, woman's wishes are paramount, strict stance on forced continuation of pregnancy
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में महिला की इच्छा को सर्वोच्च मानते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया कि किसी भी महिला, खासकर नाबालिग को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाली व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता का अहम हिस्सा है।
नाबालिग की इच्छा को प्राथमिकता, 7 महीने की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति
इस फैसले में कोर्ट ने 15 वर्ष की नाबालिग की इच्छा को प्रमुख मानते हुए उसे सात महीने की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी। अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में महिला का निर्णय ही निर्णायक होना चाहिए, न कि उस अजन्मे बच्चे का, जिसका अस्तित्व अभी विकसित हो रहा है।
जजों की पीठ ने रखी संवेदनशील सोच, महिला के अधिकार को बताया केंद्रीय
यह फैसला जस्टिस बीवी नागरत्ना और उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने कहा कि महिला की इच्छा, उसका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य किसी भी अन्य तर्क से अधिक महत्वपूर्ण है।
गोद देने का तर्क बताया असंवेदनशील, महिला पर दबाव को किया खारिज
अदालत ने यह भी कहा कि यह कहना कि महिला बच्चा पैदा कर उसे गोद दे सकती है, एक असंवेदनशील और अव्यावहारिक सोच है। अनचाहे गर्भ को जबरन जारी रखने के लिए कहना महिला के हितों और उसकी गरिमा की अनदेखी है।
अनुच्छेद 21 के तहत मिला अधिकार, कोर्ट ने दी स्पष्ट व्याख्या
कोर्ट ने दोहराया कि प्रजनन से जुड़े निर्णय लेने का अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता का अभिन्न हिस्सा है। खासकर नाबालिगों और अनचाहे गर्भधारण के मामलों में इस अधिकार को सीमित नहीं किया जा सकता।
मानसिक दबाव को भी माना अहम आधार, बच्ची ने की थी आत्महत्या की कोशिश
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि संबंधित नाबालिग ने दो बार आत्महत्या का प्रयास किया था। कोर्ट ने इसे गंभीर मानसिक दबाव का संकेत मानते हुए अपने फैसले में इसे महत्वपूर्ण आधार बनाया।
गैरकानूनी तरीकों से बचाने का संदेश, अदालत ने दी चेतावनी
अदालत ने कहा कि यदि ऐसे मामलों में राहत नहीं दी जाएगी तो महिलाएं मजबूरी में गैरकानूनी और खतरनाक तरीकों का सहारा ले सकती हैं, जो उनके जीवन के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
महिला अधिकारों की दिशा में बड़ा कदम, न्यायपालिका का संवेदनशील दृष्टिकोण
इस फैसले को महिला अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के क्षेत्र में एक अहम मील का पत्थर माना जा रहा है, जो भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मार्गदर्शक बनेगा।