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Supreme Court's important observation: Judges cannot be burdened with speedy hearings.
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को न्यायिक व्यवस्था में बढ़ते काम के दबाव को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि हाई कोर्ट के जजों पर अतिरिक्त बोझ डालकर मामलों की त्वरित सुनवाई का निर्देश नहीं दिया जा सकता।शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट को एक मामले की जल्द सुनवाई का आदेश देने की मांग पर विचार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि किसी एक मामले को प्राथमिकता देने का सीधा असर दूसरे लंबित मामलों पर पड़ता है।
सीजेआइ सूर्यकांत ने सुनाया इलाहाबाद हाई कोर्ट का उदाहरण
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक घटना का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय समय सीमा के भीतर मामला निपटाने के दबाव में एक जज को नियमित काम खत्म होने के बाद भी शाम करीब 7 बजे तक कोर्ट में बैठना पड़ा था।सीजेआइ ने कहा कि संबंधित जज ने अपने आदेश में लिखा था कि उन्होंने लंच तक छोड़ दिया, लगातार काम किया और अब वह इतने थक चुके हैं कि फैसला लिखवाने की स्थिति में नहीं हैं।उन्होंने कहा कि न्यायिक आदेश में इस तरह की टिप्पणी चिंता का विषय है और यह व्यवस्था को लेकर आत्ममंथन की जरूरत भी दिखाती है।
‘एक केस को प्राथमिकता देंगे तो दूसरे प्रभावित होंगे’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों में पहले से ही बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं। ऐसे में हर मामले के लिए समय सीमा तय करना व्यावहारिक नहीं है।सीजेआइ सूर्यकांत ने कहा कि जिस जज ने यह टिप्पणी लिखी थी, उनके सामने उस समय 200 से अधिक नए मामले लंबित थे। ऐसे में किसी एक केस को तत्काल प्राथमिकता देने से बाकी मामलों पर असर पड़ना तय है।उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट जब किसी मामले में शीघ्र सुनवाई का अनुरोध करता है, तब भी यह देखना जरूरी होता है कि संबंधित अदालत पर पहले से कितना कार्यभार है।
वसीयत मामले में भी सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने वसीयत और कानूनी वारिसों से जुड़े एक अन्य मामले में भी महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि केवल प्राकृतिक उत्तराधिकारियों को संपत्ति से बाहर कर देना किसी वसीयत को संदिग्ध या अमान्य साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि वसीयत का मूल उद्देश्य ही सामान्य उत्तराधिकार क्रम को बदलना होता है।
कर्नाटक की संपत्ति बहन के नाम करने वाली वसीयत को माना वैध
सुप्रीम कोर्ट ने दिवंगत बी शीना नैरी की पत्नी और बच्चों की ओर से दायर अपील खारिज कर दी। परिवार ने उस वसीयत को चुनौती दी थी, जिसमें नैरी ने अपनी कर्नाटक स्थित संपत्तियां अपनी बहन लक्ष्मी के नाम कर दी थीं।शीर्ष अदालत ने ट्रायल कोर्ट, अपीलीय अदालत और कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसलों को बरकरार रखते हुए वसीयत को वैध माना।