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Supreme Court issues major signal on religious traditions vs women's rights, reserves verdict on several cases including Sabarimala
नई दिल्ली। भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े बहुचर्चित मामलों पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है। नौ जजों की संविधान पीठ ने साफ कहा कि न्यायिक समीक्षा केवल अधिकार नहीं बल्कि संवैधानिक कर्तव्य है और सामाजिक सुधार से जुड़े मामलों में अदालत अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती।
सबरीमाला से शुरू हुई बहस अब कई धर्मों तक पहुंची
यह मामला मूल रूप से सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश प्रतिबंध से जुड़ा है, लेकिन सुनवाई के दौरान कई अन्य धार्मिक परंपराएं भी बहस के केंद्र में रहीं। इनमें मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश पर रोक, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं के खतना की प्रथा और पारसी समुदाय में दूसरे धर्म में शादी करने वाली महिलाओं के बहिष्कार जैसे मुद्दे शामिल हैं।
16 दिन चली मैराथन सुनवाई, नौ जजों की पीठ ने सुनी दलीलें
संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत सहित नौ न्यायाधीशों ने लगातार 16 दिन तक सुनवाई की। पीठ में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एमएम सुंद्रेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, एजी मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जोयमाल्या बाग्ची भी शामिल रहे।
केंद्र सरकार ने सबरीमाला पर परंपरा का किया समर्थन
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी का समर्थन किया। केंद्र की ओर से कहा गया कि यह मामला धार्मिक आस्था और संप्रदाय की स्वायत्तता से जुड़ा है, इसलिए अदालत को इसमें सीमित दखल देना चाहिए। सरकार ने तर्क दिया कि हर धार्मिक परंपरा और संप्रदाय की मान्यताओं का सम्मान जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अदालत जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक अदालतें सामाजिक न्याय और मौलिक अधिकारों की रक्षा से पीछे नहीं हट सकतीं। पीठ ने कहा कि जब किसी धार्मिक प्रथा और संवैधानिक मूल्यों के बीच टकराव होता है, तब न्यायिक समीक्षा जरूरी हो जाती है।
इन सात बड़े संवैधानिक सवालों पर आएगा फैसला
संविधान पीठ अब जिन सात महत्वपूर्ण सवालों पर फैसला देगी, उनमें शामिल हैं:
- धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की सीमा क्या है
- धार्मिक संप्रदायों के अधिकार और व्यक्तिगत अधिकारों का संतुलन कैसे तय होगा
- क्या धार्मिक प्रथाएं मौलिक अधिकारों से ऊपर हो सकती हैं
- संवैधानिक नैतिकता का दायरा क्या है
- धार्मिक प्रथाओं पर अदालत की समीक्षा की सीमा कितनी होनी चाहिए
- ‘हिंदुओं के वर्ग’ की संवैधानिक परिभाषा क्या है
- क्या कोई बाहरी व्यक्ति धार्मिक प्रथा के खिलाफ जनहित याचिका दायर कर सकता है
देशभर में फैसले पर टिकी नजरें
यह फैसला केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि आने वाले समय में धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार और संवैधानिक नैतिकता के बीच संतुलन तय करने वाला ऐतिहासिक निर्णय साबित हो सकता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का असर देश की कई धार्मिक और सामाजिक परंपराओं पर पड़ सकता है।