

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

Supreme Court stern towards protesters
नई दिल्ली। दिल्ली में इंडिया गठबंधन और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनों से जुड़े मामलों पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत याचिकाकर्ता पक्ष के एक वकील पर नाराज हो गए। अदालत की कार्यवाही के बीच बार-बार दखल देने पर उन्होंने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “क्या कोर्ट को मछली बाजार समझ रखा है? इस तरह का आचरण नहीं चल सकता।”
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने याचिकाकर्ताओं को एक ही तरह के मुद्दों पर बार-बार मिलती-जुलती याचिकाएं दाखिल करने से भी बचने की हिदायत दी। उन्होंने कहा कि ऐसी याचिकाओं से सुनवाई की प्रक्रिया में अनावश्यक मुश्किलें पैदा होती हैं।
प्रदर्शन से कारोबार प्रभावित होने का मुद्दा उठा
दरअसल, दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडिया गठबंधन और कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शनों के बाद पुलिस कार्रवाई, निगरानी और विरोध प्रदर्शन के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की गई हैं।
मंगलवार को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। उन्होंने अदालत को बताया कि सभी मुद्दों पर अलग-अलग जवाब तैयार कर लिया गया है और उसे दाखिल किया जा रहा है।
वहीं, व्यापारिक संगठनों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि दिल्ली में लगातार हो रहे प्रदर्शनों से कारोबार प्रभावित हो रहा है। उन्होंने बताया कि रामलीला मैदान के आसपास बड़े थोक बाजार हैं, जहां लाखों लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है। ऐसे में प्रदर्शनों के कारण व्यापारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। उन्होंने अदालत से इस समस्या का समाधान निकालने की मांग की।
17 दिनों तक चला धरना, संसद मार्च का भी आह्वान
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि प्रदर्शन के लिए जुलाई में केवल एक दिन की अनुमति ली गई थी, लेकिन प्रदर्शनकारी 17 दिनों तक धरने पर बैठे रहे। इसके बाद संसद मार्च का आह्वान भी किया गया।
उन्होंने प्रदर्शनकारियों की ओर से निजता के अधिकार का हवाला दिए जाने पर भी सवाल उठाए। मेहता ने कहा कि यदि इस तर्क को इसी तरह लागू किया गया तो CCTV कैमरों को बंद करने की मांग भी उठ सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल तस्वीरें कैप्चर होने के आधार पर किसी व्यक्ति की पहचान कर उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया जाता।
प्रदर्शन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार: याचिकाकर्ता
दूसरी ओर, याचिकाकर्ता पक्ष के वकील ने दलील दी कि विरोध प्रदर्शन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि जिस स्थान पर प्रदर्शन होगा, उसके आसपास व्यापारिक गतिविधियां होना स्वाभाविक है। इसलिए केवल कारोबार प्रभावित होने के आधार पर प्रदर्शन के अधिकार को रोका नहीं जा सकता। इसी दौरान एक वकील के बार-बार बोलने पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने नाराजगी जताई और अदालत में अनुशासन बनाए रखने की हिदायत दी।
प्रदर्शनकारियों की फोटो और वीडियो बनाने पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड करने की पुलिस की कार्रवाई का मुद्दा उठाया। उन्होंने इस संबंध में दाखिल याचिका पर नोटिस जारी करने की मांग की। उनका तर्क था कि प्रदर्शन के दौरान लोगों की तस्वीरें और वीडियो कैप्चर करना उनके निजता के अधिकार का उल्लंघन है।
प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन पर जोर
इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रदर्शन के मौलिक अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था, व्यापारियों के हित और पुलिस की निगरानी जैसे अहम सवाल उठे।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी निर्धारित प्रदर्शन स्थल पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं किया जा सकता। प्रदर्शनकारियों को अनुमति के तहत तय समय और शर्तों का पालन करना जरूरी है।