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Supreme Court's strictness on voter list: Arbitrariness will not be tolerated in SIR, removal of names can have serious consequences
नई दिल्ली। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ बिहार समेत कई राज्यों में चल रही एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई कर रही है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का खतरा है, जिससे उनके लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
नागरिक अधिकारों पर प्रभाव को लेकर कोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि यदि किसी प्रशासनिक प्रक्रिया से नागरिकों के मौलिक और वैधानिक अधिकार प्रभावित होते हैं, तो उसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(2) के तहत निर्धारित विधि के अनुसार ही लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि कोई भी संवैधानिक या वैधानिक शक्ति न्यायिक समीक्षा से परे नहीं हो सकती।
सुरक्षा प्रावधानों को नजरअंदाज करने पर सवाल
कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि जब गहन समीक्षा के दौरान मतदाता सूची को नए सिरे से तैयार किया जाता है, तो क्या निर्वाचन आयोग मौजूदा सुरक्षा प्रावधानों और कानूनी प्रक्रियाओं को दरकिनार कर सकता है। पीठ ने पूछा कि मतदाता सूची जैसे संवेदनशील दस्तावेज में बदलाव करते समय अतिरिक्त सावधानी क्यों नहीं बरती जा रही।
दस्तावेजों की संख्या बढ़ाने पर आपत्ति
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने आयोग से यह भी सवाल किया कि जब फॉर्म-6 के तहत मतदाता पंजीकरण के लिए 7 दस्तावेज निर्धारित हैं, तो एसआईआर प्रक्रिया के दौरान 11 दस्तावेजों की शर्त कैसे जोड़ी गई। कोर्ट ने इसे नियमों से परे बताया और स्पष्ट जवाब मांगा।
निर्वाचन आयोग की दलील
निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कोर्ट को बताया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) आयोग को विशेष समीक्षा कराने का स्वतंत्र अधिकार देती है और यह सामान्य संशोधन प्रक्रिया से अलग है। उन्होंने यह भी कहा कि एसआईआर प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत मताधिकार के सिद्धांतों के अनुरूप है।