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Supreme Court takes a stern view of the ruling that attempting to remove a salwar does not constitute an attempt to rape... seeks a response from the Patna High Court.
नई दिल्ली। पटना हाई कोर्ट के उस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है, जिसमें एक महिला की सलवार उतारने की कोशिश और अनुचित तरीके से स्पर्श किए जाने की घटना को दुष्कर्म के प्रयास के रूप में स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में की गई कुछ टिप्पणियों को आपत्तिजनक बताते हुए पटना हाई कोर्ट की रजिस्ट्री को नोटिस जारी किया है।प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने बुधवार को मामले पर सुनवाई की। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट के फैसले में ऐसी टिप्पणियां की गई हैं जिनकी न्यायिक समीक्षा जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान लेने का कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि मामला यौन अपराध से जुड़े न्यायिक दृष्टिकोण और ऐसे मामलों में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा से जुड़ा है।
पटना हाई कोर्ट ने नौ जुलाई को दुष्कर्म के आरोपित एक व्यक्ति को राहत देते हुए उसकी दोषसिद्धि रद कर दी थी। मामला एक फोटोग्राफी स्टूडियो के भीतर महिला ग्राहक के साथ कथित यौन उत्पीड़न के प्रयास से जुड़ा था।हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि महिला की सलवार उतारने का प्रयास और अनुचित तरीके से स्पर्श किए जाने की बात अपने आप में दुष्कर्म के प्रयास को स्पष्ट रूप से साबित नहीं करती। अदालत ने यह भी कहा था कि अभियोजन पक्ष आरोपों को आवश्यक स्तर तक प्रमाणित करने में सफल नहीं रहा।
पटना हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी टिप्पणी की थी कि यदि अभियोजन पक्ष के आरोपों को पूरी तरह सही मान भी लिया जाए, तो अधिकतम भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल के इस्तेमाल का मामला बन सकता है।इसी टिप्पणी और फैसले में इस्तेमाल किए गए कुछ शब्दों पर अब सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए हैं। शीर्ष अदालत ने संकेत दिया कि फैसले में मौजूद कुछ टिप्पणियों की न्यायिक समीक्षा आवश्यक है। इसी के तहत हाई कोर्ट की रजिस्ट्री को नोटिस जारी किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले को स्वतः संज्ञान में लेते हुए कहा कि फैसले में कुछ ऐसी टिप्पणियां हैं जिन पर न्यायिक स्तर पर दोबारा विचार किए जाने की जरूरत है। अदालत की ओर से फिलहाल अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया गया है। हाई कोर्ट की रजिस्ट्री से जवाब मांगा गया है और आगे की सुनवाई में मामले के कानूनी पहलुओं पर विचार किया जाएगा।यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में अदालतों की भाषा और घटनाओं की कानूनी व्याख्या पर व्यापक न्यायिक प्रभाव पड़ सकता है।
इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान में अवैध खनन रोकने की कोशिश के दौरान एक वन रक्षक की डंपर से कुचलकर हुई मौत के मामले का भी संज्ञान लिया। अदालत ने कहा कि अवैध खनन से जुड़े मामलों में केवल घटना के बाद कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रभावी निवारक कदम उठाना भी जरूरी है।यह मामला पहले से लंबित स्वतः संज्ञान मामले से जुड़ा है, जिसका संबंध नेशनल चंबल सेंचुरी में अवैध बालू खनन और संकटग्रस्त जलीय वन्यजीवों के सामने पैदा हो रहे खतरे से है।
राजस्थान के मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के समक्ष हुई। मामले का उल्लेख करते हुए अदालत को राजस्थान में एक वन अधिकारी की डंपर से कुचलकर हत्या की जानकारी दी गई।पीठ ने मामले में मौजूद वकील से अगली सुनवाई के दौरान जवाब के साथ तैयार रहने को कहा और सुनवाई के लिए छह अक्टूबर की तारीख तय की। अदालत ने अवैध खनन से जुड़े मामलों में प्रभावी रोकथाम और सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया।