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Centre should reconsider new UGC regulations; Supreme Court says the interests of every student must be protected.
नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से एक बार फिर विचार करने को कहा है। अदालत ने जोर दिया कि नियम बनाते समय हर छात्र के हित, सुरक्षा और सम्मान का ध्यान रखा जाना चाहिए। केंद्र ने कोर्ट को बताया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव रोकने से जुड़े इन नियमों की समीक्षा के लिए एक विशेष समिति गठित करने पर विचार किया जा रहा है।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि नई पीढ़ी की चिंताओं और उसके हितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि सभी वर्गों के विद्यार्थियों की आशंकाओं का समाधान करना सरकार की मंशा है। कोई भी छात्र खुद को उपेक्षित या असुरक्षित महसूस न करे, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसके बाद कोर्ट ने मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी।
यूजीसी ने 13 जनवरी को उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए नए नियम अधिसूचित किए थे। इसके बाद सामान्य वर्ग के कुछ याचिकाकर्ताओं ने नियमों के तहत समान सुरक्षा नहीं मिलने की आशंका जताई। वहीं, दूसरे पक्षों का कहना है कि एससी, एसटी और ओबीसी विद्यार्थियों को जातिगत भेदभाव से बचाने के लिए विशेष प्रावधान जरूरी है।सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को इन नियमों पर प्रथम दृष्टया अस्पष्टता और उनके दुरुपयोग की आशंका जताते हुए रोक लगा दी थी। फिलहाल वर्ष 2012 के पुराने नियम लागू है। केंद्र सरकार अगस्त में भी अदालत को बता चुकी है कि नए प्रावधानों पर दोबारा विचार किया जा रहा है।
विवाद की प्रमुख वजह यूजीसी के नियम 3(1)(सी) में दी गई जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा है। इस प्रावधान में एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के सदस्यों के साथ उनकी जाति या जनजाति के आधार पर किए गए भेदभाव को जाति आधारित भेदभाव माना गया है।याचिकाकर्ताओं की आपत्ति है कि इस विशेष परिभाषा में सामान्य वर्ग के छात्र और शिक्षक शामिल नहीं है। उनका तर्क है कि इससे सभी वर्गों को समान संरक्षण मिलने का सवाल उठता है। हालांकि, नियमों में भेदभाव की एक व्यापक परिभाषा भी रखी गई है, जिसके तहत किसी भी संबंधित पक्ष के साथ जाति के आधार पर अनुचित व्यवहार को शामिल किया गया है।
इस मामले की पृष्ठभूमि वर्ष 2019 से जुड़ी है। रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं ने उसी साल सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। उन्होंने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने और विद्यार्थियों को सुरक्षा देने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाने की मांग की थी।
यूजीसी के नए नियमों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भी अपनी चिंता जाहिर कर चुका है। संघ के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने हाल ही में कहा था कि संगठन इन प्रावधानों को असंतुलित बता चुका है। उन्होंने कहा था कि इस विषय पर सरकार जो भी अगला कदम उठाए, उसमें सभी पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।