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Supreme Court's important decision on reservation, reserved category candidates will not be able to claim general category seats.
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की पात्रता और प्रतियोगी परीक्षाओं में मिलने वाली रियायतों को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई उम्मीदवार आरक्षित श्रेणी की सीट के लिए आवेदन करता है और परीक्षा प्रक्रिया के दौरान आरक्षण से मिलने वाली रियायत का लाभ लेता है, तो वह बाद में अनारक्षित यानी जनरल सीट पर नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता, भले ही उसके अंक सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के बराबर या उनसे अधिक क्यों न हों।
शीर्ष अदालत ने कहा कि आरक्षण नीति का लाभ लेने के बाद उम्मीदवार को पूरी चयन प्रक्रिया में उसी श्रेणी के तहत माना जाएगा। विशेष रूप से यह स्पष्ट किया गया कि यदि आरक्षित श्रेणी का कोई उम्मीदवार प्रारंभिक परीक्षा (प्रीलिम्स) में आयु सीमा, कट-ऑफ अंक या अन्य किसी प्रकार की रियायत का लाभ उठाता है, तो वह मुख्य परीक्षा और अंतिम चयन में भी उसी आरक्षित श्रेणी में रहेगा। केवल फाइनल मेरिट में बेहतर रैंक हासिल करने के आधार पर वह जनरल सीट पर दावा नहीं कर सकता।
यह फैसला जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने सुनाया। पीठ ने केंद्र सरकार की याचिका स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। कर्नाटक हाई कोर्ट ने अनुसूचित जाति के एक उम्मीदवार को अनारक्षित श्रेणी में नियुक्ति की अनुमति दी थी, क्योंकि अंतिम परीक्षा की मेरिट सूची में उसकी रैंक सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार से बेहतर थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि आरक्षण नीति का उद्देश्य पिछड़े और अनुसूचित वर्गों को समान अवसर देना है, न कि उन्हें दोहरी सुविधा उपलब्ध कराना। यदि किसी उम्मीदवार ने चयन प्रक्रिया के किसी भी चरण में आरक्षण का लाभ लिया है, तो वह बाद में सामान्य श्रेणी में स्थानांतरण का दावा नहीं कर सकता। अदालत के इस फैसले से देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी भर्तियों में आरक्षण से जुड़े मामलों में स्पष्टता आएगी और भविष्य में ऐसी नियुक्तियों को लेकर होने वाले विवादों पर भी विराम लगने की उम्मीद है।