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Tata Trusts raises legal questions regarding Chandrasekaran's reappointment... signals intent to challenge the board's decision.
नई दिल्ली। टाटा संस में चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के कार्यकाल को पांच साल और बढ़ाने के बोर्ड के फैसले के बाद टाटा ट्रस्ट्स और कंपनी प्रबंधन के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। 17 सितंबर को हुई बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन को मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद एक और पांच साल के लिए कार्यकारी चेयरमैन बनाए जाने का प्रस्ताव बहुमत से पारित हुआ। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने प्रस्ताव का विरोध किया।टाटा ट्रस्ट्स ने इस फैसले की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा है कि कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के तहत ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों की सहमति चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति के लिए जरूरी है। ट्रस्ट्स ने संकेत दिया है कि इस मुद्दे पर आगे कानूनी रास्ता अपनाया जा सकता है।
टाटा ट्रस्ट्स के अनुसार चंद्रशेखरन ने 12 अगस्त 2026 को बोर्ड को पत्र देकर मौजूदा कार्यकाल समाप्त होने के बाद दोबारा चेयरमैन पद के लिए खुद को पेश नहीं करने की जानकारी दी थी। ट्रस्ट्स का कहना है कि इस निर्णय को उसने स्वीकार कर लिया था और इसके बाद उत्तराधिकारी के चयन के लिए प्रक्रिया शुरू करने को कहा गया था।हालांकि, 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन ने बोर्ड के अनुरोध पर अपने पहले के फैसले पर पुनर्विचार किया और बोर्ड ने चार के मुकाबले एक मत से उन्हें अगले कार्यकाल के लिए फिर नियुक्त करने का प्रस्ताव पारित किया। नोएल टाटा ने इसके खिलाफ मतदान किया।
टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि कंपनी के आर्टिकल्स के अनुसार चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति से जुड़े प्रस्ताव को वैध बनाने के लिए ट्रस्ट्स के दोनों नामित निदेशकों का समर्थन जरूरी है। ट्रस्ट्स के मुताबिक नोएल टाटा के प्रस्ताव के खिलाफ मतदान करने के बाद बोर्ड का फैसला इन प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।नोएल टाटा ने बोर्ड बैठक में पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ से प्राप्त कानूनी राय भी रखी थी। ट्रस्ट्स का कहना है कि बोर्ड ने इस राय पर विचार नहीं किया। कानूनी राय की पूरी सामग्री सार्वजनिक नहीं की गई है।
टाटा संस में नेतृत्व को लेकर मतभेद के साथ कंपनी की लिस्टिंग का मुद्दा भी विवाद का प्रमुख हिस्सा बन गया है। बोर्ड ने 17 सितंबर की बैठक में आरबीआई के नियमों के अनुरूप टाटा संस को सूचीबद्ध करने की दिशा में कदम आगे बढ़ाने का फैसला किया। नोएल टाटा ने इस प्रस्ताव का भी विरोध किया।आरबीआई ने हाल में टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रूप में अपना पंजीकरण वापस लेने के आवेदन को खारिज किया था। इसके बाद कंपनी पर लागू नियामकीय आवश्यकताओं के तहत लिस्टिंग का मुद्दा और महत्वपूर्ण हो गया है।
टाटा ट्रस्ट्स टाटा संस का सबसे बड़ा शेयरधारक है और उसके पास करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। शापूरजी पालोनजी समूह के पास लगभग 18.4 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ऐसे में चेयरमैन की नियुक्ति और टाटा संस की लिस्टिंग से जुड़े फैसलों का कंपनी के नियंत्रण और भविष्य की शासन व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।
चंद्रशेखरन की पांच साल की पुनर्नियुक्ति की खबर के बाद गुरुवार को कई सूचीबद्ध टाटा कंपनियों के शेयरों में तेजी देखी गई। हालांकि अगले कारोबारी सत्र में टाटा समूह की कई कंपनियों के शेयरों में गिरावट भी दर्ज हुई, क्योंकि चेयरमैन के कार्यकाल और टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर ट्रस्ट्स और बोर्ड के बीच मतभेद सामने आ गए।टाटा संस ने कहा है कि चंद्रशेखरन मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद अगले पांच साल के लिए कार्यकारी चेयरमैन के रूप में जिम्मेदारी संभालेंगे। दूसरी ओर, टाटा ट्रस्ट्स ने नियुक्ति की वैधता पर अपना विरोध कायम रखा है, जिससे मामले में आगे कानूनी और कॉरपोरेट स्तर पर गतिविधियां बढ़ने की संभावना बनी हुई है।