

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

The End of Maoism: The Power of Democracy Has Outstripped the Gun – Brijmohan Agarwal
रायपुर। छत्तीसगढ़और भारत की आंतरिक सुरक्षा पर दशकों से भारी चुनौती बने माओवाद का आज निर्णायक अंत देखने को मिल रहा है। यह सफलता सिर्फ सुरक्षा बलों की सैन्य कार्रवाई का परिणाम नहीं, बल्कि स्पष्ट नीति, राजनीतिक इच्छाशक्ति और केंद्र-राज्य समन्वय की जीत है। यह सिद्ध हो चुका है कि लोकतंत्र की सामूहिक शक्ति के सामने बंदूक कभी टिक नहीं सकती।
माओवाद की उत्पत्ति और विकास
1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ यह आंदोलन जल्द ही विकास विरोधी हिंसा में बदल गया। इसे शुरू में सामाजिक-आर्थिक संघर्ष के रूप में पेश किया गया, लेकिन समय के साथ यह हिंसक 'उगाही तंत्र' और मनीवाद में बदल गया। छत्तीसगढ़ का दुर्गम अबूझमाड़ क्षेत्र रणनीतिक केंद्र बन गया, जहां खनिज संपदा और सीमित शासन पहुंच ने माओवादियों को पनाह दी।
रणनीतिक बदलाव और जन आंदोलन
2003-2006 के दौरान जब मैं छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री था, तब ज्वाइंट एफर्ट, ज्वाइंट कमांड और ज्वाइंट पॉलिसी के तहत ठोस रणनीति बनाई गई। विधानसभा में पहली बार गोपनीय बैठकें आयोजित की गईं ताकि जनप्रतिनिधि निर्भय होकर समाधान सुझा सकें। इसी दौर में महेंद्र कर्मा के नेतृत्व में सलवा जुडूम आंदोलन शुरू हुआ, जिसमें स्थानीय आदिवासियों ने माओवादियों के अमानवीय व्यवहार और शोषण के खिलाफ आवाज उठाई।
हालांकि, कई माओवादी गतिविधियां अब केवल लेवी वसूली और आर्थिक स्वार्थ तक सीमित रह गई थीं। रूस और चीन जैसे देशों ने अपने-अपने इतिहास में छोड़ी गई इस विचारधारा को भारत में आतंक और आर्थिक लाभ के साधन के रूप में देखा।
निर्णायक मोड़ और आधुनिक प्रयास
वास्तविक परिवर्तन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में आया। दिसंबर 2023 से मार्च 2026 के बीच सुरक्षा बलों ने 'जीरो टालरेंस' नीति अपनाते हुए सैकड़ों माओवादियों को खत्म किया और हजारों को आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित किया।
इस परिणाम ने छत्तीसगढ़ के लिए शांति और विकास के द्वार खोल दिए। अब राज्य के दुर्गम क्षेत्रों में सड़क, मोबाइल नेटवर्क, स्कूल और स्वास्थ्य सेवाओं का जाल फैल रहा है। 'गनतंत्र' का स्थान धीरे-धीरे 'जनतंत्र' और विकास से भरे समाज ने ले लिया है।
नीतिगत स्पष्टता और भविष्य की दिशा
अतीत में माओवाद के प्रति अस्पष्ट नीतियां इसे फैलाने का अवसर देती थीं। अब स्पष्ट नीति, समन्वित रणनीति और निरंतर विकास कार्य इसे जड़ से खत्म करने में सफल हुए हैं। बस्तर और अन्य प्रभावित क्षेत्रों में सामाजिक और मानसिक बदलाव भी नजर आने लगे हैं।
हमारा संकल्प है कि 2047 तक छत्तीसगढ़ को विकसित भारत की तर्ज पर समृद्ध बनाया जाए। आत्मसमर्पण करने वाले युवाओं का पुनर्वास और उनके समाज में समावेश के लिए ठोस प्रयास जारी रहेंगे।