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The country's system has failed the test – Dr. Yogendra Srivastava
आखिर नीट-2 परीक्षा सम्पन्न हो ही गई। पेपर लीक हुआ या नहीं इसका पता तो बाद में चलेगा लेकिन परीक्षा की तैयारी की खबरें ऐसी थीं जैसे युद्ध होने वाला हो। देश के 551 शहरों में लगभग ढाई लाख सुरक्षाकर्मी तैनात थे और पेपर समय हर केन्द्र तक पहुंचाने के लिये एयर फोर्स के विमानों का उपयोग किया गया। साथ ही अतिरिक्त सावधानी के लिये छात्रों के बीच अत्यंत लोकप्रिय और ऑनलाइन ग्रुप स्टडी में उपयोगी सोशल मीडिया एप "टेलीग्राम" पर 22 जून तक के लिए प्रतिबन्ध लगा दिया गया। परीक्षार्थियों की तलाशी इस कदर की गई जैसे वो परीक्षा केन्द्रों में नहीं बल्कि बारूद के गोदामों में घुसने वाले हों। बहरहाल अब तक सब ख़ैरियत है।
जिस देश के इंजीनियर सारी दुनिया में छाये हुये हैं और अमेरिका जैसे अमीर देश में बड़ी बड़ी टेक्नोलॉजी कम्पनियों के सीईओ हैं उस देश का परीक्षा सिस्टम बदहाल होना बेहद शर्मनाक है। हम अपने देश में ऐसी व्यवस्था बनाने में एकदम नाकाबिल साबित हुए जिसमें प्रतियोगी परीक्षाओं की पवित्रता और पारदर्शिता बरकरार रहे। भले ही कड़ी सुरक्षा और सावधानी के साथ नीट-2 करवा लिया गया है लेकिन आम नागरिक और पीड़ित छात्रों का परीक्षाओं पर भरोसा कायम नहीं हुआ है। सब इसी अनिश्चितता और संदेह में हैं कि न जाने आगे इस परीक्षा का अंजाम क्या हो! लगभग हर प्रतियोगी परीक्षा के बाद सैकड़ों याचिकाएं दौर होती हैं जिनके कारण कभी रिजल्ट रोक जाता है और कभी भर्ती प्रक्रिया। कभी कभी तो पूरी की पूरी परीक्षा ही निरस्त कर दी जाती है जैसा इस साल के नीट के साथ हुआ। ऐसे में छात्र यह सोच कर भी आशंकित रहते हैं कि फिर अगले वर्षों में परीक्षा की क्या गारंटी है?
लगातार बदलती शिक्षा नीति के दिखावे के पीछे किसी की भी असल मंशा शिक्षा सुधार की नहीं है। नीतियां बदलीं, नेता बदले, शासन करने वाली पार्टियां भी बदलीं और शिक्षा के साथ प्रयोग के शगल भी बदलते रहे। हकीकत यह है कि हमने अपनी गलतियों से सबक नहीं लिया और एक ऐसा कमजोर ढांचा तैयार किया जो न अच्छी शिक्षा प्रदान कर पा रहा है और साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं को ढंग से सम्पन्न करवाने में भी असफल है। व्यापम जैसे घोटाले इस बात का प्रमाण हैं कि परीक्षा के हर स्तर पर गड़बड़ी सम्भव है जो सालों साल तक छिपी भी रह सकती है। पैसे और प्रभाव के दम पर पेपर लीक, नकली परीक्षार्थी, मनमाना मूल्यांकन, रिजल्ट शीट में हेरफेर आदि किया जा सकता है जिससे अनेक सुपात्र उचित अवसर से वंचित हो जाते हैं।
प्रतियोगी परीक्षाओं के दौर से पहले केवल बोर्ड परीक्षाओं के अंकों के आधार पर ही उच्च शिक्षा हेतु प्रवेश दिया जाता था। तब समाज में नैतिकता थी, कानून का डर था और स्कूली शिक्षा का स्तर बहुत अच्छा था। धीरे धीरे कोचिंग क्लॉस के प्रचलन के बाद स्कूली शिक्षा की स्थिति बद से बदतर होती गई। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि बहुत से नामी स्कूल भी "डमी" संस्थानों में तब्दील हो चुके हैं जहां छात्रों का कागजों एडमीशन तो दिखाया जाता है लेकिन पढ़ाई के लिए उन्हें कोचिंग में जाने की छूट रहती है। ये स्कूलों और कोचिंग संस्थानों की मिलीभगत है जिसने शिक्षा के पारम्परिक ढांचे को ध्वस्त कर दिया है। इसके दुष्प्रभाव केवल शिक्षा तक सीमित नहीं बल्कि सामाजिक मूल्यों और पारिवारिक बुनावट तक भी पहुंच रहे हैं। पुरानी स्कूल शिक्षा में छात्र लम्बी अवधि तक एक साथ पढ़ने के परिणामस्वरूप आपसी संबंधों का महत्व और सामंजस्य सीखते थे और किशोरावस्था के दौरान भावनात्मक परिवर्तनों के दौरान उन्हें साथियों का संबल तथा शिक्षकों का मार्गदर्शन भी उपलब्ध था। अब कोचिंग की गलाकाट स्पर्धा में सम्बन्ध, सामंजस्य का अवसर ही नहीं मिलता क्योंकि छात्र एक दूसरे से आगे निकलने के लिये मशीनों की तरह MCQ करने में व्यस्त रहते हैं।
प्रजातंत्र के तीनों स्तम्भ न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका दरअसल अच्छी शिक्षा से ही मजबूत तथा परिपक्व होते हैं लेकिन अफसोस कि देश में शिक्षा व्यवस्था में निरन्तर गुणात्मक गिरावट हुई है और पढ़ाई को सिर्फ पैकेज से जोड़कर देखा जा रहा है। शिक्षण संस्थानों का स्तर सिर्फ इसी बात से तय होता है कि कोर्स पूरा करने के बाद छात्रों को कितना मोटा शुरुआती पैकेज मिलता है। सीधी सी बात है कि अच्छी शिक्षा ही अच्छे नागरिक पैदा कर सकती है। परन्तु हमारी शिक्षा अब ज्ञान और मूल्यों पर केन्द्रित नहीं बल्कि सवालों को तेज हल करने और प्रतियोगी परीक्षा में ऊँचा रैंक हासिल करने तक सीमित रह गई है जबकि समाज और प्रजातंत्र की सेहत के लिये अच्छी शिक्षा अनिवार्य तत्व है।
पेपर लीक और दोबारा परीक्षा की इस आपा धापी के दौरान यह वास्तविकता तो उजागर हो चुकी है कि हमारा सिस्टम परीक्षाएँ सुचारू और विश्वसनीय तरीके से सम्पन्न करवाने में फेल हो चुका है। वस्तुस्थिति यह है कि गुणवत्ताहीन शिक्षा के चलते हम विचारक तैयार करने के बजाय मोटे पैकेजों वाले मजदूर तैयार कर रहे हैं। और इसी वजह से परीक्षाओं के प्रति चूहा-दौड़ का माहौल है जिसमें छात्र और उनके माता-पिता जबरन भागने के लिये मजबूर हैं। अब भी समय है कि तार्किक और व्यावहारिक शिक्षा नीति के जरिये पढ़ाई और परीक्षा की व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन किया जाये वरना समाजिक और प्रजातांत्रिक मूल्यों में गिरावट इसी तरह जारी रहेगी।