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The 'invisible Naxal network' poses a challenge in Bastar, with displaced people afraid to return to their villages due to fear of Panchayat committees.
जगदलपुर। बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे को लेकर सरकार के दावों के बीच एक नई और जटिल चुनौती सामने आई है। पुलिस का कहना है कि अब जंगलों में बड़े हथियारबंद नक्सली दस्ते लगभग खत्म हो चुके हैं, लेकिन बिना वर्दी और हथियार के काम करने वाले ‘पंचायत कमेटी’ के सदस्य अब भी अंदरूनी गांवों में प्रभाव बनाए हुए हैं। यही वजह है कि सड़क और कैंप जैसी सुविधाएं बढ़ने के बावजूद विस्थापित ग्रामीण अपने घर लौटने से डर रहे हैं।
पंचायत कमेटी: संगठन की ‘ऑक्सीजन’
पंचायत कमेटी नक्सली संगठन का जमीनी ढांचा है, जो गांवों में रहकर काम करता है। ये सदस्य सामान्य ग्रामीणों की तरह रहते हैं न वर्दी, न हथियार जिससे इनकी पहचान करना बेहद मुश्किल हो जाता है। इनका मुख्य काम सुरक्षाबलों की गतिविधियों की सूचना देना और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने वालों को निशाना बनाना है।
पहचान न होना सबसे बड़ी चुनौती
सुरक्षाबलों के लिए सबसे बड़ी समस्या ऐसे 10 से अधिक नक्सलियों की है, जिनके नाम रिकॉर्ड में हैं लेकिन उनकी कोई स्पष्ट प्रोफाइल या हालिया तस्वीर उपलब्ध नहीं है। अरनपुर के नंदकुमार, पामेड़ के कैलाश और किशोर जैसे नामों के साथ महिला नक्सली राजे, क्रांति, मासे सोढ़ी और धनी भी सक्रिय बताई जा रही हैं। चेहरा और लोकेशन का अभाव इन्हें पकड़ना मुश्किल बना रहा है।
क्यों खतरनाक है यह नेटवर्क?
अदृश्य मौजूदगी: ये सदस्य खेती-किसानी करते हुए आम ग्रामीणों में घुले-मिले रहते हैं।
मजबूत इंटेलिजेंस: सुरक्षाबलों की हर गतिविधि की सूचना तुरंत जंगल में बैठे कमांडरों तक पहुंचती है।
सामाजिक दबाव: गांव लौटने वालों को गद्दार घोषित कर उनकी संपत्ति छीन ली जाती है।
भर्ती का जरिया: युवाओं को बहलाकर संगठन में शामिल करने का काम भी यही करते हैं।
सीमावर्ती इलाकों में अब भी डर का माहौल
बीजापुर और सुकमा की सीमा से लगे पामेड़ जैसे इलाकों में सैकड़ों परिवार आज भी दंतेवाड़ा में शरण लिए हुए हैं। पंचायत कमेटी के डर के कारण वे अपने गांव लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।
विकास बढ़ा, लेकिन डर कायम
पिछले पांच वर्षों में हालात काफी बदले हैं। पहले जहां जनअदालतों में सरेआम सजा दी जाती थी और सड़कें ध्वस्त थीं, वहीं अब 12 से ज्यादा मुख्य सड़कें और कई कैंप स्थापित हो चुके हैं। इसके बावजूद ग्रामीणों के मन में पंचायत कमेटियों का डर अब भी गहरा है।
पुलिस की अपील और सख्त चेतावनी
पुलिस लगातार बचे हुए नक्सलियों से मुख्यधारा में लौटने की अपील कर रही है। हाल ही में तेलंगाना में 47 नक्सलियों के आत्मसमर्पण के बाद दबाव और बढ़ा है। दंतेवाड़ा के एसपी गौरव राय के अनुसार, सरकार की पुनर्वास नीति सभी के लिए खुली है, लेकिन यदि कोई विकास में बाधा डालता है या सुरक्षाबलों पर हमला करता है, तो उसका जवाब मुठभेड़ में दिया जाएगा।